कपिल देव

कपिल देव
चित्र

Friday, April 10, 2009

समय जो सबका पिता है

कपिलदेव

यह समझाने का समय नहीं है
समझने का भी नहीं
यह
समझने और समझाने से बाहर निकल जाने का समय है
समय से बाहर
निकल जाने का समय

सूरज नें अपने घोड़ों को कार्यमुक्त कर दिया है
सुबह और शाम की दूरियां पूरी करता है अब
स्वचालित यान से
टापों का शोर अब नहीं सुनाई देता
घोड़ों का हिन-हिन
किसी मल्टीनेशनल कम्पनी
ने सौदा कर लिया है
घोड़ों की चर्वी निकाली जाएगी
सांपों का कृतृम जहर बनेगा
पिलाया जाएगा विष कन्याओं को

समय की धूपघड़ी
अब किसी सूरज का मुहताज नहीं
सूरज अब किसी धूप घड़ी के लिए नहीं उगता
डूबता भी नहीं किसी कन्या कुमारी के अंतरीप में

ठुक ठुक आवाजों के बीच
सुनाई देता समय
गायब कर दिया है किसी
अभियांत्रिक नें
घड़ी साजों की आंखों पर चिपका लेंस गिर गया है
समय की इक्कीसवीं तारीख के आस पास
जो उसके होने की आहट थी

सोचा जो, वह कहा नहीं
कहा वह नहीं,
जो सोचा
कहने और सोचने के बीच
फंसा है यह समय।

जिद ने तर्क को पीछे ठेल दिया है
वत्सलता को काठ मार गया है
भविष्य काभय
माताओं की कोख में
भ्रूणों को
इतिहास से आगे निकल जाने काकैप्सूल कोर्सकरा रहा है

अजन्मा वक्त कहता है--
नहीं, अब और नहीं
गर्भस्थ हूं तो क्या-
सवाल तो करूंगा मांगूगा पिताओं से
निश्चित-निश्चिंत उज्वल वर्तमान
धरती पर आने की
कीमत वसूलूंगा।

भविष्य और वर्तमान की संधि पर बैठा
विलाप कर रहा है
अबूढ़ा समय

बिला गए हैं उसके सपने
कट गई है डोर
कब कहां गिरेगा बूढ़ा समय
जो सबका पिता है,
खो गया है उसका प्रमाण-पत्र
पुरखों का दिया
10-4-09

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