कपिल देव

कपिल देव
चित्र

Wednesday, June 30, 2010

अनुवाद श्रृंखला: वियतनामी कहानी 2

सवालिया निशान

लेखक :ः डो आन ली
हिन्दी अनुवाद: कपिलदेव
(इस कहानी की लेखिका डो आन ली का जन्म 15 अप्र्र्र्र्र्र्रैल 1943को, वियतनाम के हायी फोंग प्रांत में हुआ। वियतनामी लेखक संगठन के प्रतिष्ठित पुरस्कार (1989-90) से सम्मानित डो आन ली शांग हुआंग मैगजीन के ए श्रेणी पुरस्कार सहित अन्य अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। मूलतः फिल्म अभिनेत्री के रूप में प्रसिद्ध ली नें कई फिल्मों का सम्पादन भी किया है। वे इस समय हायी फांग प्रांत स्थित कला-संस्कृति केन्द्र की प्रबंध निदेशिका हैं।
वू आन ली नें इस कहानी का, मूल वियतनामी से अंग्रेजी में अनुवाद कर के हमें उपलब्ध कराया है। यह कहानी ‘बया’ के मार्च 2010 अंक में प्रकाशित हो चुकी है। (अनुवादक)

पिछले इतवार को वह अपने सत्रहवें प्रेमी की मृत्यु पर दाह कर्म में शामिल होने गई थी। जी हां, यह उसका सत्रहवां प्रेमी था। तेईस प्रेमियों में सत्रहवां! वह एक फिल्म निर्देशक था और उसकी ही गली में रहता था। वह उसे सबसे अधिक चाहती थी।
जो सबसे पहले गुजरा, वह उसका आठवां प्रेमी था। वह कवि था। उसके बाद ग्यारहवां,जो एक चित्रकार था। पांचवा,जिसकी मृत्यु पिछले साल हुई,वह सेना में एक जनरल रह चुका था। उसने इन तीनों की अर्थी पर सफेद गुलाब रख कर उन्हें विदा किया था।
हर बार की तरह इसबार भी लोग शव को अर्थी पर रखे जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। अर्थी पर रख दिये जाने के बाद सबसे पहले उसके एक करीबी सम्बन्धी नें उठ कर शव को अंतिम विदा का प्रणाम किया। उसके बाद दूसरे सगे सम्बन्धी। फिर मित्र और अन्य लोग। सबके बाद वह शांति पूर्वक अर्थी तक आयी और तमाम आंखों के बीच, अर्थी के सिरहाने गुलाब के फूलों का एक गुच्छा रख दी थी। ऐसा करते हुए उसे गर्व की अनुभूति हुई थी। अपने प्रेमी को इतने नजदीक से अंतिम विदाई देते हुए उसे लगा कि वह उन लोगों को चुनौती दी है, जो उसका मजाक उड़ाते रहते हैं ।

‘‘ प्रिय ! हमें माफ करना, औरों की तरह मै तुम्हारी अर्थी पर सिर टिका कर अपने दिल का शोक व्यक्त करने का साहस नहीं कर सकती। डार्लिंग! मैं तो यहां खुल कर रो भी नहीं सकती। इसलिए दिल की गहराई से उमड़ते आंसुओं को गुलाब के इन फूलों में छिपा कर तुम्हें सौपने आई हूं.......। ’’ अंतिम प्रणाम के लिए अर्थी पर झुके झुके ही वह फुसफुसाई। मानो कफन में लिपटा वह मृत शरीर उसके दिल से निकली इन बातों को सचमुच ही सुन रहा हो। फिर चुपचाप वापस चली आई थी।
धार्मिक त्यौहारों पर, चढ़ावे का सामान बेचने वाले एक दूकानदार के कहने पर एक बार उसने अपने स्वर्गीय प्रेमी,जो सेना में जनरल रह चुका था, की कब्र पर एक तलवार और घोड़ा अर्पित किया था। इसी तरह वह अपने एक अन्य प्रेमी(जो कवि था) को अच्छा सा घर और कविता लिखने के लिए बहुत सारा कागज भेंट की थी। चित्रकला के क्षेत्र में मशहूर एक तीसरे प्रेमी को तो वह ढेर सारा ब्रश,पेंट तथा विदेशी शराब की एक महंगी बोतल भी अर्पित कर चुकी थी। इन चढ़ावों पर करीब तीन लाख डांग का खर्च आया था। लेकिन इतना खर्च करने के बाद वह बहुत संतुष्ट अनुभव कर रही थी। उसे विश्वास था कि उसके द्वारा अर्पित सामान उसके प्रेमियों को अवश्य मिलंेगे। उसके दिवंगत प्रेमी चढ़ावे की रात अपनी भावनाओं का इजहार करने उसके सपनों में आते भी थे।

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यह सब बातें उसकी दो डायरियों से पता चलीं। ये डायरियां हमें अचानक ही मिल गई थीं। कुछ इसतरह, मानों किसी झंझावाती रात में ओलों की जगह आसमान से टूट कर दो खूबसूरत तारे हमारी गोद में आ गिरे हों। पहली चीज, जिसे देख मैं चकित रह गई,वह उसकी खूबसूरत लिखावट थी। मैनें कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि हमारे एपार्टमेंट में घूम घूम कर अखबार और किताबें बेचने वाली,उस कुबड़ी नाटी महिला की लिखावट इतनी सुंदर होगी। उसके अक्षरों को देख कर मुझ जैसी अनुभवी टीचर के लिए यह समझना मुश्किल न था कि इस सुंदर लिखावट के पीछे उसका कितना दर्द छिपा होगा। उसकी लिखावट देख मेरा मन एकबारगी उसके लिए सम्मान की भावना से भर उठा। अब वह एक बिलकुल अलग व्यक्तित्व की महिला नजर आने लगी थी- एक उच्चशिक्षित और रोमैंटिक भावना से परिपूर्ण सुंदर युवती ! मानों ईश्वर नें किसी अभिशापित परी के पवित्र हृदय की सुंदरता को छिपाने के लिए उसकी पीठ पर कूबड़ बना दिया हो।
डायरी का हर पृष्ठ गुलाब की सूखी पत्तियों से सुवासित था। पढ़ते हुए मैं डायरी के पृष्ठों पर संकेताक्षरों में लिखे गये नामों और वाक्यों में छिपी कोमलता को महसूस कर रही थी। कुल तेईस नामेंा में, जनरल केा पी.एच कह कर संबोधित किया गया था। हो सकता है कि उसका नाम मिस्टर फैन,फियु, फुआंग या ऐसा ही कुछ रहा हो! हां,मैं उस आदमी को तो जरूर ही जानती थी जिसका नाम ची फिओ था और जो एक अभिनेता भी था। इसलिए कि उसनें किसी मैगजीन से काट कर उसका चित्र अपनी डायरी में चिपका रखा था। प्रमियों की सूची में उसका नाम तेरहवें क्रम पर था। उसके प्यार में वह पागल थी। लेकिन बहुत जल्दी ही वह उससे निराश भी हो गई थी।

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‘‘ आप हमें क्यों इस तरह अनमनेपन से देख रहे थे? आप नें क्या मेरे कांपते हाथों को बिलकुल ही महसूस नहीं किया, जब मैं आप को वह लिफाफा दे रही थी?’’
मैनें कहा था, ‘‘ आप को वापस करने के लिए मेरे पास फुटकर पैसे नहीं हैं। इसलिए, आप यह लिफाफा और अखबार ले लें। पैसे मैं बाद में ले लूंगी ’’
उस सुबह आप के सानिध्य में कुछ देर तक रहने का सुख पाने की मेरी चालाकी को आप भांप नहीं सके थे। आप ने कहा था, ‘‘ अरे नहीं...नहीं...। आप मुझे शर्मिंदा न करें। ’’
‘‘आप ने अपनी सभी जेबों को खंगाल डाला। और खुशी के मारे जेैसे उछल ही पड़े थे। आप को किसी जेब की पर्स में पांच सौ डांग का एक मुड़ा-तुड़ा सा नोट मिल गया था। मैनें आप की ओर देखा और मन हुआ कि कहूं, ‘‘हंसी से छलकती-सी आप की आंखे कितनी भोली और सुंदर है !’’ पहले आप ने नोट की सिकुड़न सीधा करने की कोशिश की। आप से नोट पाने के लिए मैं स्वयं काउन्टर से निकल कर बाहर आ गई और दोनों हाथों को आगे बढ़ा कर नोट ले लिया था। हालांकि नोट लेने के लिए चल कर बाहर आने की जरूर नहीं थी। मुझे नहीं पता कि आप नें मेरे इस विचित्रपने को किस तरह महसूस किया। अथवा महसूस किया भी या नहीं। ऐसा करके मैं तो दर असल आप के सुडौल और स्वस्थ शरीर से उठती हुई सुगंध को नजदीक से महसूस करना चाहती थी।’’
‘‘ अपनी मोटी आवाज में कुछ कहते हुए आप चले गये थे। आप के जाने से मेरे मन में दर्द की एक लहर दौड़ गई थी। क्या पता फिर कब आप की आवाज सुनने को मिलेगी! मैं मन ही मन चाहती थी कि आफिस से घर लौटते समय आप हमारी तरफ एक नजर देख ठीक उसी तरह मुसकरायें जैसे एक प्रेमी अपनी पे्रमिका को देखकर मुसकराता है। पता नहीं मेरी यह साध कब पूरी होगी! आप की एक जरा सी मुसकराहट मेरी जिन्दगी मंे खुशियां भर देने के लिए काफी होगी....।’’

उस रात जनरल उसके सपनों में आया था। बाद में भी वह कई बार उसके सपनों में आया।

लेकिन तीन सप्ताह ही बीते होंगे कि एक दिन उसने जनरल को किसी सुंदर-सी युवती के हाथ में हाथ डाल कर प्यार भरी मस्ती में जाते हुए देखा। किसी गहरे दोस्त की तरह वे आपस में हंस हंस कर बाते भी करते जा रहे थे। उसकी दुकान के सामने से दोनों कुछ इस तरह गुजरे जैसे कि दिखाकर उसे जलाना चाहते हों। जनरल नें तो उसकी तरफ नजर उठा कर देखा तक नहीं। अपनी जिंदगी में वह पहले कभी इस तरह दुखी नहीं हुई थी। लेकिन वह उनसे नाराज भी नहीं थी। वह तो सिर्फ उसे भूल जाना चाहती थी।

जनरल,जो उसका तेरहवां प्रेमी था, को उसनें मन ही मन कहा, ‘‘ गुड बाय’’

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इसके लिए कृपया हमें माफ करें कि मैं उसके सभी तेईस प्रेमियों के किस्से नहीं सुना सकती। क्योकि यदि ये अपने आप को यंत्रणा देने की इच्छा से गढ़ी हुई कहानियां नहीं हैं, तो जरूर ही अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए गढ़े गए भ्रम हैं। यह भी हो सकता है कि दुनिया में अपने प्रेम की अफवाहें फैलाने के लिए उसनें झूठी कहानियों से भरी यह डायरी लिख छोड़ी हो। जेा भी हो, इतना मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि उसके बाक्स में मिली यह डायरी मैंने शब्द-दर-शब्द पृष्ठ -दर-पृष्ठ खूब ध्यान से पढी है।
और मुझे पूरा विश्वास है कि उसने अपने सभी तेईस प्रेमियों को दिल से प्यार किया है। हमारे-आप जैसे लोग , जो अपने प्रमी की जरा सी बेवफाई भी सहन नहीं कर सकते, भला यह कैसे कह सकते हैं कि सच्चे प्रेम की चाहत में एक पर एक तेईस प्रमियों को बदलते रहना उसकी गलती थी ? वह सच्चे प्यार की भूखी थी और सोचती थी कि सच्चे समर्पण की भावना से उससे प्यार करने वाला कोई तो जरूर होगा। उसका उदार दिल महान इच्छाओं से भरा हुआ था। उसमें मामूलीपन और तुच्छताओं का लेश भी न था। शारीरिक कुरूपताओं के बावजूद, उसकी इसी खूबी नें मेरे मन में उसके लिए गहरा आदर भर दिया था।

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दोपहर का वक्त था। मैं सो रही थी। मगर कुछ ही देर बाद बाहर की आवाजों से नीद खुल बई। इतने में किसी नें दरवाजा खटखटाया। यह बूढ़ा दुआ था। दरवाजे पर भयभीत सा खड़ा!
- ‘‘मैडम, हियु मर गई।’’ उसनें कहा।
यह सुन मैं उछल कर विस्तर से बाहर आ गई। सैन्डिल पहनना तक भूल गई । दुआ साल में केवल एक बार - नए वर्ष की शुभ कामना देने मेरे यहां आया करता था। वर्षों पहले- जबसे वह पड़ोस में आया, तभी से इस औपचारिकता का पालन करता आ रहा था। इसलिए, बेवक्त और इस सूचना के साथ उसके आने से मैं परेशान हो उठी थी।
‘‘ भला यह हुआ कैसे ?’’ मैने पूछा।
‘‘ आज मैने सुबह से दोपहर तक उसे घर का कोई काम काज निपटाते नहीं देखा। बाहर जाने के लिए घर बंद कर के जब मैं चाभी देने के इरादे से उसका दरवाजा खटखटाया तो अंदर से कोई आवाज नहीं आई। तब मुझे कुछ संदेह हुआ। मैने मिसेज ताई को बुलाया। बड़ी मुशकिल से दरवाजा तोड़ कर जब हम अंदर घुसे तो देखा कि वह सोई पड़ी थी।’’ हांफते हुए दुआ नें बताया।
अब मै समझ गई थी कि आवाजें वहीं से आ रही थीं। उस अपार्टमेंट में मेरे अलावा तीन और परिवार रहते थे। जबकि बूढ़ा दुआ और मिस हियू सामने के पुराने गैरेज को बांट कर बनाए गये दो अलग अलग कमरों में अपना जीवन गुजार रहे थे। दुआ परचून की एक चलती फिरती छोटी सी दुकान चलाता था। वह रोज ट्राली लेकर, हाथ-लाउडस्पीकर पर गाना गाते हुए, गेट से बाहर निकलता- ‘‘ जाते हैं लोग एक के बाद एक... एक जाता है दूसरा दुख भरी आंखों से जाते हुए देखता है...’’ ।
मिस हियू एपार्टमेंट के गेट के सामने पेड़ के नीचे अपना बुकस्टाल लगाती थीं। हम सब उस मकान में बड़े आराम से रह रहे थे। कहीं कोई परेशानी नहीं थी।

‘‘हमें स्थानीय अधिकारी को इसकी सूचना दे देनी चाहिए। हालांकि नियम कानून से चलना भी भारी लफड़े वाला काम है।’’ मैने दुआ से कहा।
‘‘ जी, मिस्टर ताई पुलिस चैकी पर सूचित करने जा चुके है। और मिस्टर थू उसके रिश्तेदारों कोे खबर करने का इंतजाम कर रहे हैं। उसके परिवार के लोग हा जियांग प्रांत में रहते हैं। जब तक हमें उनके आने की प्रतीक्षा करनी होगी , हम चाहते हैं कि आप भी यहीं आ कर.....’’
दुआ के पीछे पीछे मैं वहां तक गई। जाते हुए,मैनें हियु बारे में अपनी जानकारी को एक बार फिर से सहेजने की कोशिश की। लेकिन तुरंत ही लगा कि नहीं, मैं तो उसके बारे में कुछ भी नहीं जानती, सिवा इसके कि वह पेड़ के नीचे किताबों की एक दुकान लगाती थी, जिसमें बहुत सारे अमरीकी नावेल होते थे और उसकी पीठ पर एक जन्मजात कूबड़ था। मगर आवाज इतनी महीन और प्यारी थी कि लगता था कि वह नहीं चाहती कि उसकी आवाज तक से किसी को कोई परेशानी हो।
‘‘ हा जिआंग में उसका कोैन रहता हैं?’’ मेैने पूछा।
‘‘ उसके दो भाई। लेाग बताते हैं कि वह किसी धनी मानी व्यापारी के घर में पैदा हुई थी। लेकिन मां-बाप के मर जाने के बाद भाइयों बहनों में एकता नहीं रह सकी। घर छोड़ कर वह हा-नो-ई चली आई, और तबसे आज तक वापस नहीं गई। लगता है कि उसके भाई स्वभाव से अच्छे नहीं थे। मैनें आज तक कभी उन्हें हियू के पास आते जाते नहीं देखा।’’ बूढ़े दुआ ने बताया।
हियु के घर में कुल दो कमरे थे जो शायद एक ही बड़े रूम को बांट कर बनाए गये थे। इसलिए उनमें अंधेरा था। मगर साफ सफाई बहुत अच्छी थी। एक ड्रेसिंग टेबुल,ऐनक और साफ सुथरी चादर बिछे एक पलंग के अलावा उसके पास कोई खास सामान नहीं था। विस्तर पर वह एक हल्के नीले ब्लैंकेट में लेटी पड़ी थी। खिड़की से आती हुई सूरज की पतली रोशनी की धार विस्तर के नीचे करीने से रखे गये साफ सुथरे सैण्डल पर पड़ रही थी......। मेरे और बूढ़े दुआ के अलावा वहां कुछ औरतें चुपचाप बैठी थीं। कुल मिला कर वातावरण इतना शांत और औपचारिक था कि मैे असहज महसूस करने लगी।
लोगो का मानना था कि उसकी मृत्यु हृदय गति रूक जाने से हुई थी। जब शाम तक, हा जियांग में रहने वाले उसके दोनों भाइयों का पता नहीं लगाया जा सका तो यह तय किया गया कि पडो़सी होने के नाते हम लोगों को ही मिल कर उसके अंतिम संस्कार का प्रबंध करना चाहिए। उसकी सज्जनता नें हम सब के दिलों में गहरी सहानुभूति पैदा कर दी थी।

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हियू का बाक्स सबके सामने खोला गया। सम्पत्ति के नाम पर उसमें एक जोड़ा झुमका,एक पासबुक जिसमें करीब तीन लाख डंाग जमा था ओैर गुजरे जमाने का बे मतलब-सा एक कढ़ाईदार कपडा पाया गया। बैंक में जमा धन उसके क्रिया कर्म के लिए पर्याप्त था। इतनें में तो बड़े मजे से उसका श्राद्ध करने के साथ साथ कब्र के लिए जमीन भी खरीदी जा सकती थी। उसके क्रिया कर्म के लिए वहीं तुरत फुरत एक समिति का गठन भी कर दिया गया। मुझे उसकी दोनों डायरियां पढ़ कर यह मालूम करने की जिम्मेदारी दी गई कि उसमें क्या कुछ खास है ।
उस रात दुआ और मैं, जो अकेला होने के अलावा बुजुर्ग भी थे, शव की देखरेख के लिए वहां रूक गये थे। बत्ती जल रही थी और दरवाजा खुला छोड़ दिया गया था। दुआ केतली भर चाय बना लाया था। वह कभी बैठता तो कभी उठ कर बुझने बुझने को हुइ धूप बत्ती जलाने लगता। फिर बैठे बैठे सामने के मैदान में उस पौधे को देखने लगता जिसमें दो खूबसूरत बड़े पत्ते निकल आए थे और जो कुछ ही दिनों में छायादार वृक्ष बन जाने वाला था। जबकि मैं हियू की डायरी पढ़नें में मशगूल थी। लोबान और अगरू की गंध के बीच मैं तो डायरी के पृष्ठों पर लिखे शब्दों के सुगंधित संसार में मानेा खो ही गई थी।
इस कमरे में रहते हुए वह हर रात कोई न कोई प्यारा सपना जरूर देखती थी। उसके प्रेमी आते,और उसके कानों में प्यार भरी बातें फुसफुसाते। सच्चे प्यार की बातें। न कोई धोखा, न झूठ। वे उसे खुश करने की कोशिश करते और इस खुशी के बदले में वह खुद को उन्हें समर्पित कर देती। हर रात यही होता। वह उनकी बाहों में समा जाती। वे उसे अपनी बाहों में दुलराते और वह मीठी नींद में सो जाती......। एक बार वह एक पत्रकार-प्रेमी के साथ एक छोटी यात्रा पर निकली थी कि तभी बरसात शुरू हो गई। बरसात से बचाने के लिए वह पत्रकार उसे अपनी बाहों में लेकर एक महल सरीखे मकान के छज्जे के नीचे खड़ा हो गया। पहली बार वह किसी पुरूष के इतने नजदीक थी। चूम लिए जाने के इंतजार में उसके होंठ कांप रहे थे। यह उसके जीवन में पहली बार हो रहा था। मगर तभी उसकी नींद टूट गई थी...... ।
हालांकि उसने यह नहीं लिखा था कि उस रात वह क्या पहने थी। लेकिन इतना तो अनुमान किया ही जा सकता है कि उस वक्त वह राजसी कपड़े में बहुत ही सुंदर लग रही होगी, ‘‘ उस समय मैं आराम से टहल रही थी, जब झील की तरफ से आती हुई हवा नें मेरे गाउन के दोनों कपाट उड़ा दिये। मुझे लगा कि बसंत का सूरज अपनी किरणों से हमारे बदन का स्पर्श स्ुाख लेना चाहता है लेकिन आसपास के लोगों की नजरें हमारा पीछा कर रही हैं। मैं उन आंखों को अपनी मुसकान भरी नजरों से देखना चाह रही थी। मगर मैनें जान बूझ कर अपने को रोक लिया। मेरा दिल तो उसके इंतजार में धड़क रहा था ...’’ उसने लिखा था।
बहुत सावधानी से बुने गये ऐसे तमाम सपने थे। एक दम त्रुटि रहित। जबकि उसके जीवन की सचाई इसके ठीक उलट थी, जिसे वह किसी भी तरह सामने नही आने देना चाहती थी। ऐसे खूबसूरत सपने देखना भगवान से बदला लेने का उसका अपना तरीका था-उस भगवान से,जिसनें निर्दयता पूर्वक उसके पीठ पर कूबड़ बना कर उसकी जिंदगी को पीड़ा से भर दिया था। इस लिहाज से अगर देखा जाय तो उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए...।
अचानक दुआ ने एक गहरी सांस ली और फुसफुसा कर हमसे कहा, ‘‘ टीचर ! डायरी में उसनें क्या लिखा है ?’’
‘‘ अरे कुछ नहीं, रोजमर्रा की बातें और अपने विचार ’’, मैनें उपेक्षा पूर्वक जवाब दिया।
‘‘ डायरी क्या उसके सगे सम्बन्ध्यिों को सुपुर्द करना जरूरी है ?’’ उसने पूछा।
‘‘ नहीं। बिलकुल नहीं। मैं यह डायरी उसके ताबूत में रख दूंगी। यह उसी के साथ रहेगी। इस डायरी से किसी को क्या लेना देना है।’’ मैनें कहा।

‘‘ मगर इस डायरी का किसी से लेना देना क्यों नहीं है ?’’ मैने मन ही मन अपने आप से सवाल किया।

असल में, मैं उसकी मौत की खबर उन उन्नीसों को बताना चाहती थी जो उसके सपनों में आया करते थे। मैं उन्हें हियू की अर्थी पर सफेद गुलाब के फूल चढ़ानें आने के लिए बाध्य करना चाहती थी-उस हिुयू की अर्थी पर, जो उन्हें बेइंतहां प्यार करती थी और जिसने अपनी मोहब्बत से इन साधारण लोगों को एक सहृदय आदर्श प्रेमी की गरिमा देकर महान बना दिया था.... मैनें मन ही मन सोच लिया था कि अगर मैं उन उन्नीसों को सूचित कर यहां तक ला नहीं पाई तो अगली सुबह खुद(चार मर चुके प्रेमियों को छोड़) उन उन्नीसों कृतघ्नों की तरफ से सफेद गुलाब के उन्नीस फूल उसकी अर्थी पर जरूर चढ़ाऊंगी।

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बूढ़ा दुआ एक बार फिर धीमी आवाज में फुसफुसाया,‘‘ ऐसा नहीं हो सकता, टीचर, कि.......’’
‘‘ क्या कहना चाहते हो’’ मेैनें आश्चर्य से पूछा ।
‘‘ हो सकता है, यह घटना नहीं घटती....अगर उस रात...’’ दुआ ने कहा।
दुआ ने अटकती हुई आवाज मे वह सब बताया जो आज से नौ वर्ष पहले बरसात की एक रात में घटा था।

नौ वर्ष पहले की बात है। दोपहर बाद से ही बरसात शुरू हो गई थी। वह एक बहुत घनघोर बरसात थी। साथ में आंधी की तरह तेज हवा भी चल रही थी। ओैर बिजली तो बीती रात से ही गायब थी। इसलिए मैं कुछ जल्दी ही विस्तर पर चला गया था। हालांकि मैंने शाम के वक्त डिनर के नाम पर भूख मिटाने वाला कोई टानिक जैसा द्रव पदार्थ ले लिया था। लेकिन तब भी कंपकंपी आ रही थी और विस्तर में घुस गया था। मैनें सोचा कि अमरीकी फैाजांे से लड़ते हुए जो चोट लगी थी,यह कमजोरी उसी का नतीजा है। चालीस पार के बाद तो सभी लोग बूढ़ा महसूस करने लगते हैं। लेकिन यहां तो मेरे शरीर के हर अंग में मानों दुश्मन नें अपना डेरा डाल दिया था। सारे ही अंग अभी से शिथिल होने लगे थे।
आधी रात तक यही सब सोचते हुए करवट बदलता रहा। अभी अभी नींद आई ही थी कि जग गया। लगा कि कोई दरवाजा खटखटा रहा है। अरे नहीं, यह तो कबाड़ हो चुके फाटक की आवाज है। जरा सा छूते ही उसके पल्ले खुलने खुलने को हो आते हैं। मैनें सिर की ऊंचाई तक कम्बल खीच कर ओढ़ लिया। फिर कपडेां की सरसराहट जैसी आवाज सुनाई पड़ी। मैं एक क्षण के लिए परेशान हुआ। हालांकि मैं न तो किसी भूतप्रेत में विश्वास करता था और न चोरों का भय सताता था। मैनें मोटी लकड़ी का एक टुकड़ा उठा कर रख लिया और बैठ कर अकनने लगा। रोशनी की एक चमक से आभास हुआ कि किसी ने दरवाजा खोल दिया है और एक छाया दरवाजे पर खड़ी है। सांस रोक कर मैं बैठा रहा। आओ जरा देखें तो तुम्हारी हिम्मत। अभी इस मेाटे कुंदे से तुम्हारा सिर फोड़ता हूं’’ मैं मन ही मन बुदबुदाया।
‘‘मिस्टर दुआ, आप के पास क्या मोमबत्ती होगी?’’
आवाज सुन कुछ तसल्ली हुई। यह किसी संकोची शालीन महिला की मीठी सी आवाज थी।
‘‘ जी हां, जरा रूकें...’’। अपना चप्पल तलाशने की गरज से मैंने जल्दी से माचिस की तीली खुरच कर प्रकाश किया। तीली की रोशनी जरा देर में ही बुझ गई। मैं अपना चप्पल टटोल ही रहा था कि मुझे एक दम अपने पास स्त्री देह की गंध महसूस हुई। दुबारा माचिस जलाने के लिए तैयार मेरेे हाथेां को एक स्त्री हाथ नें रोक दिया ‘‘ नहीं नहीं,लाइट जलाने की जरूरत नहीं है....’’ उस स्त्री ने कहा। बाहर बरसात लगातार बढ़ती ही जा रही थी...
दुआ बोलते बोलते अचानक चुप हो गया । मेरा भी दिल जैसे धड़कना बंद कर दिया था। तो यह बात थी! लेकिन उसने जो कुुछ कहा, उसमें से किसी भी बात का जिक्र हियु की डायरी में नहीं था। यहां तक कि दुआ के नाम तक का जिक्र न था। इसलिए मैंने उसे संदेह से देखा। हमारी प्रतिक्रिया पर बिना गौर किये वह सूने आसमान की तरफ देखने लगा।
‘‘ जो हो, उसने अपनी आत्मा से तो कुछ भी छिपाया न होगा।’’ मैनें सोचा। किसी सार्थक नतीजे के बिना ही, कहानी का अंत हो गया था; ‘‘ बेचारी गरीब हियु!’’
देगची की चपटी पेंदी पर जमा कर रखी गई मोमबत्ती हवा के झोंके से बुझ गई। मोमबत्ती बुझते ही ऐसा लगा कि वहां कोई तीसरा व्यक्ति भी था जो उन दोनों को एकांत में छोड़ चला गया है। इस एकांत से दुआ को घबराहट हुई। उठकर उसने मोमबत्ती जला दी।
मुझे कंपकंपी सी महसूस हुई। लगा कि हियु यहीं आस पास घूम घूम कर हमारी बातें सुन रही है। तभी मुझे हलकी सी पदचाप सुनाई पड़ी। क्या वह आ रही है? लेकिन यह तो पड़ोस की आंटी थीं। थू आंटी । क्रास नस्ल की चाइनीज आंटी मेरे से एक घर आगे वाले घर में रहती थीं। वे तुरंत का तैयार किया हुआ ताजा जूस ले कर आई थीं।
‘‘ मुझे नींद नहीं आ रही। मैं बहुत दुखी महसूस कर रही हूं। इस दुनिया में उसके जैसा सज्जन बहुत कम हैं। मैनें कई आदमियों से उसका परिचय कराया। लेकिन कोई भी उसे पसंद नही आया।’’ आंटी नें कहा।
मैनें दुआ की तरफ देखा। मन में आया कि दुआ से कहूं ,‘‘तुमने थू आंटी की बातें सुनीं ? ऐसा कभी मत सोचना कि हियू इतनी सरलता से किसी के हाथ आने वाली महिला थी। जरा अपना झुर्रियों से भरा चेहरा तो देखो। माना कि नौ वर्ष पहले तुम कुछ युवा दिखते रहे होगे। लेकिन किसकी तुलना में ? तुम्हारे जैसे परचूनिये दुकानदार के पास सम्पत्ति के नाम पर एक ठेला के अलावा और है ही क्या ? तुम्हें कोई किस बात के लिए घास डालेगा ?’’ मेै ईष्र्या से भर उठी थी। ‘‘ आखिर कोई पवित्र हृदय वाली भावुक स्त्री भला अपना कौमार्य दुआ जैसे एक बूढे़ खूसट की बाहों में केैसे दे सकती हैं?
थू आंटी जा चुकी थीं। दुआ नें दुबारा चाय बनाई। चाय की प्याली से इठलाकर ऊपर को उठती भाप कमल के फूल जैसी गंध वाली अगरबत्ती के धुएं के साथ मिल कर पूरे कमरे में फैल गई । भाप की उर्मियों नें कमरे को गर्मी के एहसास से भर दिया ।
‘‘कितने दुख की बात थी कि हियू के पास बैठ कर दुख के आंसू बहाने वाला उसका एक भी सगा संबंधी न था। जहां तक मुझे याद हेै, एक बार उसनें मां बनने की इच्छा जाहिर की थी। हां,अगर सिर्फ ......’’
अब मुझे बूढ़े दुआ की बातें सुनने से एतराज नहीं रह गया था। हो सकता है कि उसके प्रति मेरी नरमी का कारण यह हो कि उसनें अभी अभी बड़े ही आदर के साथ चाय पिलाई थी। या अपनी तुलना एक ऐसी स्त्री से करने के कारण जो बहुत सुंदर और आकर्षक है मगर मां बनने में असमर्थ है....।
‘‘ काश अगर उसके पास एक बच्चा होता।’’ बहुत धीरे से मैनें दुआ से कहा।
‘‘हां, मै जानता हूं। मां बनने की उसकी इच्छा इतनी प्रबल थी कि एक रात वह मेरे पास चली आई थी। लेकिन मैं......’’ दुआ का चेहरा लटक गया था,जैसे उसका पूरा तन बदन दर्द से छटपटा उठा हो।
क्षमा याचना के अंदाज में दुआ नें हमारी तरफ देखा। उसका समूचा शरीर कांप रहा था।
‘‘ मैं उसकी सहायता नहीं कर सका.... टीचर ! अमरीकी सेना की बुलेट नें मेरे पौरूष को असमर्थ बना दिया है। अब मैं इस काम के काबिल नहीं रह गया हूं। मैनें अपने को मरा सरीखा मान लिया हेै। इसी वजह से, चुपचाप अपना गांव छोड़ यहां चला आया।’’
अब मैं दुआ से आंख मिलाने का साहस खो चुकी थी। जीवन ! यों तो देखने में मेरे एपार्टमेंट का जीवन बड़ा ही शांत है। लेकिन भीतर भीतर वेदना की प्रबल धारा बह रही है।
मैनें हियु केा याद करते हुए अगरूबत्ती का एक गुच्छा और जला दिया। पतले ब्लैंकेट के नीचे अकड़ कर टेढ़ा हो चुका हियु का निर्जीव शरीर एक प्रश्नवाचक चिन्ह जैसा दिख रहा था। हे ईश्वर!!! यही तो है धरती का वह सबसे बड़ा सवाल जो तुम्हें प्रश्नांकित करता है।
पताः 11ई-सिद्धार्थ नगर कालोनी। अनुवाद: कपिलदेव
पोस्टः सिद्धार्थ इनक्लेव
तारामण्डल रोड-गोरखपुर,273017
फोन: 09451347673, ई मेल ाण्कमअजतपचंजीप/हउंपसण्बवउ

ईमेल - ाण्कमअजतपचंजीप/हउंपसण्बवउ

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