सवालिया निशान
लेखक :ः डो आन ली
हिन्दी अनुवाद: कपिलदेव
(इस कहानी की लेखिका डो आन ली का जन्म 15 अप्र्र्र्र्र्र्रैल 1943को, वियतनाम के हायी फोंग प्रांत में हुआ। वियतनामी लेखक संगठन के प्रतिष्ठित पुरस्कार (1989-90) से सम्मानित डो आन ली शांग हुआंग मैगजीन के ए श्रेणी पुरस्कार सहित अन्य अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। मूलतः फिल्म अभिनेत्री के रूप में प्रसिद्ध ली नें कई फिल्मों का सम्पादन भी किया है। वे इस समय हायी फांग प्रांत स्थित कला-संस्कृति केन्द्र की प्रबंध निदेशिका हैं।
वू आन ली नें इस कहानी का, मूल वियतनामी से अंग्रेजी में अनुवाद कर के हमें उपलब्ध कराया है। यह कहानी ‘बया’ के मार्च 2010 अंक में प्रकाशित हो चुकी है। (अनुवादक)
पिछले इतवार को वह अपने सत्रहवें प्रेमी की मृत्यु पर दाह कर्म में शामिल होने गई थी। जी हां, यह उसका सत्रहवां प्रेमी था। तेईस प्रेमियों में सत्रहवां! वह एक फिल्म निर्देशक था और उसकी ही गली में रहता था। वह उसे सबसे अधिक चाहती थी।
जो सबसे पहले गुजरा, वह उसका आठवां प्रेमी था। वह कवि था। उसके बाद ग्यारहवां,जो एक चित्रकार था। पांचवा,जिसकी मृत्यु पिछले साल हुई,वह सेना में एक जनरल रह चुका था। उसने इन तीनों की अर्थी पर सफेद गुलाब रख कर उन्हें विदा किया था।
हर बार की तरह इसबार भी लोग शव को अर्थी पर रखे जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। अर्थी पर रख दिये जाने के बाद सबसे पहले उसके एक करीबी सम्बन्धी नें उठ कर शव को अंतिम विदा का प्रणाम किया। उसके बाद दूसरे सगे सम्बन्धी। फिर मित्र और अन्य लोग। सबके बाद वह शांति पूर्वक अर्थी तक आयी और तमाम आंखों के बीच, अर्थी के सिरहाने गुलाब के फूलों का एक गुच्छा रख दी थी। ऐसा करते हुए उसे गर्व की अनुभूति हुई थी। अपने प्रेमी को इतने नजदीक से अंतिम विदाई देते हुए उसे लगा कि वह उन लोगों को चुनौती दी है, जो उसका मजाक उड़ाते रहते हैं ।
‘‘ प्रिय ! हमें माफ करना, औरों की तरह मै तुम्हारी अर्थी पर सिर टिका कर अपने दिल का शोक व्यक्त करने का साहस नहीं कर सकती। डार्लिंग! मैं तो यहां खुल कर रो भी नहीं सकती। इसलिए दिल की गहराई से उमड़ते आंसुओं को गुलाब के इन फूलों में छिपा कर तुम्हें सौपने आई हूं.......। ’’ अंतिम प्रणाम के लिए अर्थी पर झुके झुके ही वह फुसफुसाई। मानो कफन में लिपटा वह मृत शरीर उसके दिल से निकली इन बातों को सचमुच ही सुन रहा हो। फिर चुपचाप वापस चली आई थी।
धार्मिक त्यौहारों पर, चढ़ावे का सामान बेचने वाले एक दूकानदार के कहने पर एक बार उसने अपने स्वर्गीय प्रेमी,जो सेना में जनरल रह चुका था, की कब्र पर एक तलवार और घोड़ा अर्पित किया था। इसी तरह वह अपने एक अन्य प्रेमी(जो कवि था) को अच्छा सा घर और कविता लिखने के लिए बहुत सारा कागज भेंट की थी। चित्रकला के क्षेत्र में मशहूर एक तीसरे प्रेमी को तो वह ढेर सारा ब्रश,पेंट तथा विदेशी शराब की एक महंगी बोतल भी अर्पित कर चुकी थी। इन चढ़ावों पर करीब तीन लाख डांग का खर्च आया था। लेकिन इतना खर्च करने के बाद वह बहुत संतुष्ट अनुभव कर रही थी। उसे विश्वास था कि उसके द्वारा अर्पित सामान उसके प्रेमियों को अवश्य मिलंेगे। उसके दिवंगत प्रेमी चढ़ावे की रात अपनी भावनाओं का इजहार करने उसके सपनों में आते भी थे।
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यह सब बातें उसकी दो डायरियों से पता चलीं। ये डायरियां हमें अचानक ही मिल गई थीं। कुछ इसतरह, मानों किसी झंझावाती रात में ओलों की जगह आसमान से टूट कर दो खूबसूरत तारे हमारी गोद में आ गिरे हों। पहली चीज, जिसे देख मैं चकित रह गई,वह उसकी खूबसूरत लिखावट थी। मैनें कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि हमारे एपार्टमेंट में घूम घूम कर अखबार और किताबें बेचने वाली,उस कुबड़ी नाटी महिला की लिखावट इतनी सुंदर होगी। उसके अक्षरों को देख कर मुझ जैसी अनुभवी टीचर के लिए यह समझना मुश्किल न था कि इस सुंदर लिखावट के पीछे उसका कितना दर्द छिपा होगा। उसकी लिखावट देख मेरा मन एकबारगी उसके लिए सम्मान की भावना से भर उठा। अब वह एक बिलकुल अलग व्यक्तित्व की महिला नजर आने लगी थी- एक उच्चशिक्षित और रोमैंटिक भावना से परिपूर्ण सुंदर युवती ! मानों ईश्वर नें किसी अभिशापित परी के पवित्र हृदय की सुंदरता को छिपाने के लिए उसकी पीठ पर कूबड़ बना दिया हो।
डायरी का हर पृष्ठ गुलाब की सूखी पत्तियों से सुवासित था। पढ़ते हुए मैं डायरी के पृष्ठों पर संकेताक्षरों में लिखे गये नामों और वाक्यों में छिपी कोमलता को महसूस कर रही थी। कुल तेईस नामेंा में, जनरल केा पी.एच कह कर संबोधित किया गया था। हो सकता है कि उसका नाम मिस्टर फैन,फियु, फुआंग या ऐसा ही कुछ रहा हो! हां,मैं उस आदमी को तो जरूर ही जानती थी जिसका नाम ची फिओ था और जो एक अभिनेता भी था। इसलिए कि उसनें किसी मैगजीन से काट कर उसका चित्र अपनी डायरी में चिपका रखा था। प्रमियों की सूची में उसका नाम तेरहवें क्रम पर था। उसके प्यार में वह पागल थी। लेकिन बहुत जल्दी ही वह उससे निराश भी हो गई थी।
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‘‘ आप हमें क्यों इस तरह अनमनेपन से देख रहे थे? आप नें क्या मेरे कांपते हाथों को बिलकुल ही महसूस नहीं किया, जब मैं आप को वह लिफाफा दे रही थी?’’
मैनें कहा था, ‘‘ आप को वापस करने के लिए मेरे पास फुटकर पैसे नहीं हैं। इसलिए, आप यह लिफाफा और अखबार ले लें। पैसे मैं बाद में ले लूंगी ’’
उस सुबह आप के सानिध्य में कुछ देर तक रहने का सुख पाने की मेरी चालाकी को आप भांप नहीं सके थे। आप ने कहा था, ‘‘ अरे नहीं...नहीं...। आप मुझे शर्मिंदा न करें। ’’
‘‘आप ने अपनी सभी जेबों को खंगाल डाला। और खुशी के मारे जेैसे उछल ही पड़े थे। आप को किसी जेब की पर्स में पांच सौ डांग का एक मुड़ा-तुड़ा सा नोट मिल गया था। मैनें आप की ओर देखा और मन हुआ कि कहूं, ‘‘हंसी से छलकती-सी आप की आंखे कितनी भोली और सुंदर है !’’ पहले आप ने नोट की सिकुड़न सीधा करने की कोशिश की। आप से नोट पाने के लिए मैं स्वयं काउन्टर से निकल कर बाहर आ गई और दोनों हाथों को आगे बढ़ा कर नोट ले लिया था। हालांकि नोट लेने के लिए चल कर बाहर आने की जरूर नहीं थी। मुझे नहीं पता कि आप नें मेरे इस विचित्रपने को किस तरह महसूस किया। अथवा महसूस किया भी या नहीं। ऐसा करके मैं तो दर असल आप के सुडौल और स्वस्थ शरीर से उठती हुई सुगंध को नजदीक से महसूस करना चाहती थी।’’
‘‘ अपनी मोटी आवाज में कुछ कहते हुए आप चले गये थे। आप के जाने से मेरे मन में दर्द की एक लहर दौड़ गई थी। क्या पता फिर कब आप की आवाज सुनने को मिलेगी! मैं मन ही मन चाहती थी कि आफिस से घर लौटते समय आप हमारी तरफ एक नजर देख ठीक उसी तरह मुसकरायें जैसे एक प्रेमी अपनी पे्रमिका को देखकर मुसकराता है। पता नहीं मेरी यह साध कब पूरी होगी! आप की एक जरा सी मुसकराहट मेरी जिन्दगी मंे खुशियां भर देने के लिए काफी होगी....।’’
उस रात जनरल उसके सपनों में आया था। बाद में भी वह कई बार उसके सपनों में आया।
लेकिन तीन सप्ताह ही बीते होंगे कि एक दिन उसने जनरल को किसी सुंदर-सी युवती के हाथ में हाथ डाल कर प्यार भरी मस्ती में जाते हुए देखा। किसी गहरे दोस्त की तरह वे आपस में हंस हंस कर बाते भी करते जा रहे थे। उसकी दुकान के सामने से दोनों कुछ इस तरह गुजरे जैसे कि दिखाकर उसे जलाना चाहते हों। जनरल नें तो उसकी तरफ नजर उठा कर देखा तक नहीं। अपनी जिंदगी में वह पहले कभी इस तरह दुखी नहीं हुई थी। लेकिन वह उनसे नाराज भी नहीं थी। वह तो सिर्फ उसे भूल जाना चाहती थी।
जनरल,जो उसका तेरहवां प्रेमी था, को उसनें मन ही मन कहा, ‘‘ गुड बाय’’
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इसके लिए कृपया हमें माफ करें कि मैं उसके सभी तेईस प्रेमियों के किस्से नहीं सुना सकती। क्योकि यदि ये अपने आप को यंत्रणा देने की इच्छा से गढ़ी हुई कहानियां नहीं हैं, तो जरूर ही अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए गढ़े गए भ्रम हैं। यह भी हो सकता है कि दुनिया में अपने प्रेम की अफवाहें फैलाने के लिए उसनें झूठी कहानियों से भरी यह डायरी लिख छोड़ी हो। जेा भी हो, इतना मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि उसके बाक्स में मिली यह डायरी मैंने शब्द-दर-शब्द पृष्ठ -दर-पृष्ठ खूब ध्यान से पढी है।
और मुझे पूरा विश्वास है कि उसने अपने सभी तेईस प्रेमियों को दिल से प्यार किया है। हमारे-आप जैसे लोग , जो अपने प्रमी की जरा सी बेवफाई भी सहन नहीं कर सकते, भला यह कैसे कह सकते हैं कि सच्चे प्रेम की चाहत में एक पर एक तेईस प्रमियों को बदलते रहना उसकी गलती थी ? वह सच्चे प्यार की भूखी थी और सोचती थी कि सच्चे समर्पण की भावना से उससे प्यार करने वाला कोई तो जरूर होगा। उसका उदार दिल महान इच्छाओं से भरा हुआ था। उसमें मामूलीपन और तुच्छताओं का लेश भी न था। शारीरिक कुरूपताओं के बावजूद, उसकी इसी खूबी नें मेरे मन में उसके लिए गहरा आदर भर दिया था।
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दोपहर का वक्त था। मैं सो रही थी। मगर कुछ ही देर बाद बाहर की आवाजों से नीद खुल बई। इतने में किसी नें दरवाजा खटखटाया। यह बूढ़ा दुआ था। दरवाजे पर भयभीत सा खड़ा!
- ‘‘मैडम, हियु मर गई।’’ उसनें कहा।
यह सुन मैं उछल कर विस्तर से बाहर आ गई। सैन्डिल पहनना तक भूल गई । दुआ साल में केवल एक बार - नए वर्ष की शुभ कामना देने मेरे यहां आया करता था। वर्षों पहले- जबसे वह पड़ोस में आया, तभी से इस औपचारिकता का पालन करता आ रहा था। इसलिए, बेवक्त और इस सूचना के साथ उसके आने से मैं परेशान हो उठी थी।
‘‘ भला यह हुआ कैसे ?’’ मैने पूछा।
‘‘ आज मैने सुबह से दोपहर तक उसे घर का कोई काम काज निपटाते नहीं देखा। बाहर जाने के लिए घर बंद कर के जब मैं चाभी देने के इरादे से उसका दरवाजा खटखटाया तो अंदर से कोई आवाज नहीं आई। तब मुझे कुछ संदेह हुआ। मैने मिसेज ताई को बुलाया। बड़ी मुशकिल से दरवाजा तोड़ कर जब हम अंदर घुसे तो देखा कि वह सोई पड़ी थी।’’ हांफते हुए दुआ नें बताया।
अब मै समझ गई थी कि आवाजें वहीं से आ रही थीं। उस अपार्टमेंट में मेरे अलावा तीन और परिवार रहते थे। जबकि बूढ़ा दुआ और मिस हियू सामने के पुराने गैरेज को बांट कर बनाए गये दो अलग अलग कमरों में अपना जीवन गुजार रहे थे। दुआ परचून की एक चलती फिरती छोटी सी दुकान चलाता था। वह रोज ट्राली लेकर, हाथ-लाउडस्पीकर पर गाना गाते हुए, गेट से बाहर निकलता- ‘‘ जाते हैं लोग एक के बाद एक... एक जाता है दूसरा दुख भरी आंखों से जाते हुए देखता है...’’ ।
मिस हियू एपार्टमेंट के गेट के सामने पेड़ के नीचे अपना बुकस्टाल लगाती थीं। हम सब उस मकान में बड़े आराम से रह रहे थे। कहीं कोई परेशानी नहीं थी।
‘‘हमें स्थानीय अधिकारी को इसकी सूचना दे देनी चाहिए। हालांकि नियम कानून से चलना भी भारी लफड़े वाला काम है।’’ मैने दुआ से कहा।
‘‘ जी, मिस्टर ताई पुलिस चैकी पर सूचित करने जा चुके है। और मिस्टर थू उसके रिश्तेदारों कोे खबर करने का इंतजाम कर रहे हैं। उसके परिवार के लोग हा जियांग प्रांत में रहते हैं। जब तक हमें उनके आने की प्रतीक्षा करनी होगी , हम चाहते हैं कि आप भी यहीं आ कर.....’’
दुआ के पीछे पीछे मैं वहां तक गई। जाते हुए,मैनें हियु बारे में अपनी जानकारी को एक बार फिर से सहेजने की कोशिश की। लेकिन तुरंत ही लगा कि नहीं, मैं तो उसके बारे में कुछ भी नहीं जानती, सिवा इसके कि वह पेड़ के नीचे किताबों की एक दुकान लगाती थी, जिसमें बहुत सारे अमरीकी नावेल होते थे और उसकी पीठ पर एक जन्मजात कूबड़ था। मगर आवाज इतनी महीन और प्यारी थी कि लगता था कि वह नहीं चाहती कि उसकी आवाज तक से किसी को कोई परेशानी हो।
‘‘ हा जिआंग में उसका कोैन रहता हैं?’’ मेैने पूछा।
‘‘ उसके दो भाई। लेाग बताते हैं कि वह किसी धनी मानी व्यापारी के घर में पैदा हुई थी। लेकिन मां-बाप के मर जाने के बाद भाइयों बहनों में एकता नहीं रह सकी। घर छोड़ कर वह हा-नो-ई चली आई, और तबसे आज तक वापस नहीं गई। लगता है कि उसके भाई स्वभाव से अच्छे नहीं थे। मैनें आज तक कभी उन्हें हियू के पास आते जाते नहीं देखा।’’ बूढ़े दुआ ने बताया।
हियु के घर में कुल दो कमरे थे जो शायद एक ही बड़े रूम को बांट कर बनाए गये थे। इसलिए उनमें अंधेरा था। मगर साफ सफाई बहुत अच्छी थी। एक ड्रेसिंग टेबुल,ऐनक और साफ सुथरी चादर बिछे एक पलंग के अलावा उसके पास कोई खास सामान नहीं था। विस्तर पर वह एक हल्के नीले ब्लैंकेट में लेटी पड़ी थी। खिड़की से आती हुई सूरज की पतली रोशनी की धार विस्तर के नीचे करीने से रखे गये साफ सुथरे सैण्डल पर पड़ रही थी......। मेरे और बूढ़े दुआ के अलावा वहां कुछ औरतें चुपचाप बैठी थीं। कुल मिला कर वातावरण इतना शांत और औपचारिक था कि मैे असहज महसूस करने लगी।
लोगो का मानना था कि उसकी मृत्यु हृदय गति रूक जाने से हुई थी। जब शाम तक, हा जियांग में रहने वाले उसके दोनों भाइयों का पता नहीं लगाया जा सका तो यह तय किया गया कि पडो़सी होने के नाते हम लोगों को ही मिल कर उसके अंतिम संस्कार का प्रबंध करना चाहिए। उसकी सज्जनता नें हम सब के दिलों में गहरी सहानुभूति पैदा कर दी थी।
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हियू का बाक्स सबके सामने खोला गया। सम्पत्ति के नाम पर उसमें एक जोड़ा झुमका,एक पासबुक जिसमें करीब तीन लाख डंाग जमा था ओैर गुजरे जमाने का बे मतलब-सा एक कढ़ाईदार कपडा पाया गया। बैंक में जमा धन उसके क्रिया कर्म के लिए पर्याप्त था। इतनें में तो बड़े मजे से उसका श्राद्ध करने के साथ साथ कब्र के लिए जमीन भी खरीदी जा सकती थी। उसके क्रिया कर्म के लिए वहीं तुरत फुरत एक समिति का गठन भी कर दिया गया। मुझे उसकी दोनों डायरियां पढ़ कर यह मालूम करने की जिम्मेदारी दी गई कि उसमें क्या कुछ खास है ।
उस रात दुआ और मैं, जो अकेला होने के अलावा बुजुर्ग भी थे, शव की देखरेख के लिए वहां रूक गये थे। बत्ती जल रही थी और दरवाजा खुला छोड़ दिया गया था। दुआ केतली भर चाय बना लाया था। वह कभी बैठता तो कभी उठ कर बुझने बुझने को हुइ धूप बत्ती जलाने लगता। फिर बैठे बैठे सामने के मैदान में उस पौधे को देखने लगता जिसमें दो खूबसूरत बड़े पत्ते निकल आए थे और जो कुछ ही दिनों में छायादार वृक्ष बन जाने वाला था। जबकि मैं हियू की डायरी पढ़नें में मशगूल थी। लोबान और अगरू की गंध के बीच मैं तो डायरी के पृष्ठों पर लिखे शब्दों के सुगंधित संसार में मानेा खो ही गई थी।
इस कमरे में रहते हुए वह हर रात कोई न कोई प्यारा सपना जरूर देखती थी। उसके प्रेमी आते,और उसके कानों में प्यार भरी बातें फुसफुसाते। सच्चे प्यार की बातें। न कोई धोखा, न झूठ। वे उसे खुश करने की कोशिश करते और इस खुशी के बदले में वह खुद को उन्हें समर्पित कर देती। हर रात यही होता। वह उनकी बाहों में समा जाती। वे उसे अपनी बाहों में दुलराते और वह मीठी नींद में सो जाती......। एक बार वह एक पत्रकार-प्रेमी के साथ एक छोटी यात्रा पर निकली थी कि तभी बरसात शुरू हो गई। बरसात से बचाने के लिए वह पत्रकार उसे अपनी बाहों में लेकर एक महल सरीखे मकान के छज्जे के नीचे खड़ा हो गया। पहली बार वह किसी पुरूष के इतने नजदीक थी। चूम लिए जाने के इंतजार में उसके होंठ कांप रहे थे। यह उसके जीवन में पहली बार हो रहा था। मगर तभी उसकी नींद टूट गई थी...... ।
हालांकि उसने यह नहीं लिखा था कि उस रात वह क्या पहने थी। लेकिन इतना तो अनुमान किया ही जा सकता है कि उस वक्त वह राजसी कपड़े में बहुत ही सुंदर लग रही होगी, ‘‘ उस समय मैं आराम से टहल रही थी, जब झील की तरफ से आती हुई हवा नें मेरे गाउन के दोनों कपाट उड़ा दिये। मुझे लगा कि बसंत का सूरज अपनी किरणों से हमारे बदन का स्पर्श स्ुाख लेना चाहता है लेकिन आसपास के लोगों की नजरें हमारा पीछा कर रही हैं। मैं उन आंखों को अपनी मुसकान भरी नजरों से देखना चाह रही थी। मगर मैनें जान बूझ कर अपने को रोक लिया। मेरा दिल तो उसके इंतजार में धड़क रहा था ...’’ उसने लिखा था।
बहुत सावधानी से बुने गये ऐसे तमाम सपने थे। एक दम त्रुटि रहित। जबकि उसके जीवन की सचाई इसके ठीक उलट थी, जिसे वह किसी भी तरह सामने नही आने देना चाहती थी। ऐसे खूबसूरत सपने देखना भगवान से बदला लेने का उसका अपना तरीका था-उस भगवान से,जिसनें निर्दयता पूर्वक उसके पीठ पर कूबड़ बना कर उसकी जिंदगी को पीड़ा से भर दिया था। इस लिहाज से अगर देखा जाय तो उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए...।
अचानक दुआ ने एक गहरी सांस ली और फुसफुसा कर हमसे कहा, ‘‘ टीचर ! डायरी में उसनें क्या लिखा है ?’’
‘‘ अरे कुछ नहीं, रोजमर्रा की बातें और अपने विचार ’’, मैनें उपेक्षा पूर्वक जवाब दिया।
‘‘ डायरी क्या उसके सगे सम्बन्ध्यिों को सुपुर्द करना जरूरी है ?’’ उसने पूछा।
‘‘ नहीं। बिलकुल नहीं। मैं यह डायरी उसके ताबूत में रख दूंगी। यह उसी के साथ रहेगी। इस डायरी से किसी को क्या लेना देना है।’’ मैनें कहा।
‘‘ मगर इस डायरी का किसी से लेना देना क्यों नहीं है ?’’ मैने मन ही मन अपने आप से सवाल किया।
असल में, मैं उसकी मौत की खबर उन उन्नीसों को बताना चाहती थी जो उसके सपनों में आया करते थे। मैं उन्हें हियू की अर्थी पर सफेद गुलाब के फूल चढ़ानें आने के लिए बाध्य करना चाहती थी-उस हिुयू की अर्थी पर, जो उन्हें बेइंतहां प्यार करती थी और जिसने अपनी मोहब्बत से इन साधारण लोगों को एक सहृदय आदर्श प्रेमी की गरिमा देकर महान बना दिया था.... मैनें मन ही मन सोच लिया था कि अगर मैं उन उन्नीसों को सूचित कर यहां तक ला नहीं पाई तो अगली सुबह खुद(चार मर चुके प्रेमियों को छोड़) उन उन्नीसों कृतघ्नों की तरफ से सफेद गुलाब के उन्नीस फूल उसकी अर्थी पर जरूर चढ़ाऊंगी।
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बूढ़ा दुआ एक बार फिर धीमी आवाज में फुसफुसाया,‘‘ ऐसा नहीं हो सकता, टीचर, कि.......’’
‘‘ क्या कहना चाहते हो’’ मेैनें आश्चर्य से पूछा ।
‘‘ हो सकता है, यह घटना नहीं घटती....अगर उस रात...’’ दुआ ने कहा।
दुआ ने अटकती हुई आवाज मे वह सब बताया जो आज से नौ वर्ष पहले बरसात की एक रात में घटा था।
नौ वर्ष पहले की बात है। दोपहर बाद से ही बरसात शुरू हो गई थी। वह एक बहुत घनघोर बरसात थी। साथ में आंधी की तरह तेज हवा भी चल रही थी। ओैर बिजली तो बीती रात से ही गायब थी। इसलिए मैं कुछ जल्दी ही विस्तर पर चला गया था। हालांकि मैंने शाम के वक्त डिनर के नाम पर भूख मिटाने वाला कोई टानिक जैसा द्रव पदार्थ ले लिया था। लेकिन तब भी कंपकंपी आ रही थी और विस्तर में घुस गया था। मैनें सोचा कि अमरीकी फैाजांे से लड़ते हुए जो चोट लगी थी,यह कमजोरी उसी का नतीजा है। चालीस पार के बाद तो सभी लोग बूढ़ा महसूस करने लगते हैं। लेकिन यहां तो मेरे शरीर के हर अंग में मानों दुश्मन नें अपना डेरा डाल दिया था। सारे ही अंग अभी से शिथिल होने लगे थे।
आधी रात तक यही सब सोचते हुए करवट बदलता रहा। अभी अभी नींद आई ही थी कि जग गया। लगा कि कोई दरवाजा खटखटा रहा है। अरे नहीं, यह तो कबाड़ हो चुके फाटक की आवाज है। जरा सा छूते ही उसके पल्ले खुलने खुलने को हो आते हैं। मैनें सिर की ऊंचाई तक कम्बल खीच कर ओढ़ लिया। फिर कपडेां की सरसराहट जैसी आवाज सुनाई पड़ी। मैं एक क्षण के लिए परेशान हुआ। हालांकि मैं न तो किसी भूतप्रेत में विश्वास करता था और न चोरों का भय सताता था। मैनें मोटी लकड़ी का एक टुकड़ा उठा कर रख लिया और बैठ कर अकनने लगा। रोशनी की एक चमक से आभास हुआ कि किसी ने दरवाजा खोल दिया है और एक छाया दरवाजे पर खड़ी है। सांस रोक कर मैं बैठा रहा। आओ जरा देखें तो तुम्हारी हिम्मत। अभी इस मेाटे कुंदे से तुम्हारा सिर फोड़ता हूं’’ मैं मन ही मन बुदबुदाया।
‘‘मिस्टर दुआ, आप के पास क्या मोमबत्ती होगी?’’
आवाज सुन कुछ तसल्ली हुई। यह किसी संकोची शालीन महिला की मीठी सी आवाज थी।
‘‘ जी हां, जरा रूकें...’’। अपना चप्पल तलाशने की गरज से मैंने जल्दी से माचिस की तीली खुरच कर प्रकाश किया। तीली की रोशनी जरा देर में ही बुझ गई। मैं अपना चप्पल टटोल ही रहा था कि मुझे एक दम अपने पास स्त्री देह की गंध महसूस हुई। दुबारा माचिस जलाने के लिए तैयार मेरेे हाथेां को एक स्त्री हाथ नें रोक दिया ‘‘ नहीं नहीं,लाइट जलाने की जरूरत नहीं है....’’ उस स्त्री ने कहा। बाहर बरसात लगातार बढ़ती ही जा रही थी...
दुआ बोलते बोलते अचानक चुप हो गया । मेरा भी दिल जैसे धड़कना बंद कर दिया था। तो यह बात थी! लेकिन उसने जो कुुछ कहा, उसमें से किसी भी बात का जिक्र हियु की डायरी में नहीं था। यहां तक कि दुआ के नाम तक का जिक्र न था। इसलिए मैंने उसे संदेह से देखा। हमारी प्रतिक्रिया पर बिना गौर किये वह सूने आसमान की तरफ देखने लगा।
‘‘ जो हो, उसने अपनी आत्मा से तो कुछ भी छिपाया न होगा।’’ मैनें सोचा। किसी सार्थक नतीजे के बिना ही, कहानी का अंत हो गया था; ‘‘ बेचारी गरीब हियु!’’
देगची की चपटी पेंदी पर जमा कर रखी गई मोमबत्ती हवा के झोंके से बुझ गई। मोमबत्ती बुझते ही ऐसा लगा कि वहां कोई तीसरा व्यक्ति भी था जो उन दोनों को एकांत में छोड़ चला गया है। इस एकांत से दुआ को घबराहट हुई। उठकर उसने मोमबत्ती जला दी।
मुझे कंपकंपी सी महसूस हुई। लगा कि हियु यहीं आस पास घूम घूम कर हमारी बातें सुन रही है। तभी मुझे हलकी सी पदचाप सुनाई पड़ी। क्या वह आ रही है? लेकिन यह तो पड़ोस की आंटी थीं। थू आंटी । क्रास नस्ल की चाइनीज आंटी मेरे से एक घर आगे वाले घर में रहती थीं। वे तुरंत का तैयार किया हुआ ताजा जूस ले कर आई थीं।
‘‘ मुझे नींद नहीं आ रही। मैं बहुत दुखी महसूस कर रही हूं। इस दुनिया में उसके जैसा सज्जन बहुत कम हैं। मैनें कई आदमियों से उसका परिचय कराया। लेकिन कोई भी उसे पसंद नही आया।’’ आंटी नें कहा।
मैनें दुआ की तरफ देखा। मन में आया कि दुआ से कहूं ,‘‘तुमने थू आंटी की बातें सुनीं ? ऐसा कभी मत सोचना कि हियू इतनी सरलता से किसी के हाथ आने वाली महिला थी। जरा अपना झुर्रियों से भरा चेहरा तो देखो। माना कि नौ वर्ष पहले तुम कुछ युवा दिखते रहे होगे। लेकिन किसकी तुलना में ? तुम्हारे जैसे परचूनिये दुकानदार के पास सम्पत्ति के नाम पर एक ठेला के अलावा और है ही क्या ? तुम्हें कोई किस बात के लिए घास डालेगा ?’’ मेै ईष्र्या से भर उठी थी। ‘‘ आखिर कोई पवित्र हृदय वाली भावुक स्त्री भला अपना कौमार्य दुआ जैसे एक बूढे़ खूसट की बाहों में केैसे दे सकती हैं?
थू आंटी जा चुकी थीं। दुआ नें दुबारा चाय बनाई। चाय की प्याली से इठलाकर ऊपर को उठती भाप कमल के फूल जैसी गंध वाली अगरबत्ती के धुएं के साथ मिल कर पूरे कमरे में फैल गई । भाप की उर्मियों नें कमरे को गर्मी के एहसास से भर दिया ।
‘‘कितने दुख की बात थी कि हियू के पास बैठ कर दुख के आंसू बहाने वाला उसका एक भी सगा संबंधी न था। जहां तक मुझे याद हेै, एक बार उसनें मां बनने की इच्छा जाहिर की थी। हां,अगर सिर्फ ......’’
अब मुझे बूढ़े दुआ की बातें सुनने से एतराज नहीं रह गया था। हो सकता है कि उसके प्रति मेरी नरमी का कारण यह हो कि उसनें अभी अभी बड़े ही आदर के साथ चाय पिलाई थी। या अपनी तुलना एक ऐसी स्त्री से करने के कारण जो बहुत सुंदर और आकर्षक है मगर मां बनने में असमर्थ है....।
‘‘ काश अगर उसके पास एक बच्चा होता।’’ बहुत धीरे से मैनें दुआ से कहा।
‘‘हां, मै जानता हूं। मां बनने की उसकी इच्छा इतनी प्रबल थी कि एक रात वह मेरे पास चली आई थी। लेकिन मैं......’’ दुआ का चेहरा लटक गया था,जैसे उसका पूरा तन बदन दर्द से छटपटा उठा हो।
क्षमा याचना के अंदाज में दुआ नें हमारी तरफ देखा। उसका समूचा शरीर कांप रहा था।
‘‘ मैं उसकी सहायता नहीं कर सका.... टीचर ! अमरीकी सेना की बुलेट नें मेरे पौरूष को असमर्थ बना दिया है। अब मैं इस काम के काबिल नहीं रह गया हूं। मैनें अपने को मरा सरीखा मान लिया हेै। इसी वजह से, चुपचाप अपना गांव छोड़ यहां चला आया।’’
अब मैं दुआ से आंख मिलाने का साहस खो चुकी थी। जीवन ! यों तो देखने में मेरे एपार्टमेंट का जीवन बड़ा ही शांत है। लेकिन भीतर भीतर वेदना की प्रबल धारा बह रही है।
मैनें हियु केा याद करते हुए अगरूबत्ती का एक गुच्छा और जला दिया। पतले ब्लैंकेट के नीचे अकड़ कर टेढ़ा हो चुका हियु का निर्जीव शरीर एक प्रश्नवाचक चिन्ह जैसा दिख रहा था। हे ईश्वर!!! यही तो है धरती का वह सबसे बड़ा सवाल जो तुम्हें प्रश्नांकित करता है।
पताः 11ई-सिद्धार्थ नगर कालोनी। अनुवाद: कपिलदेव
पोस्टः सिद्धार्थ इनक्लेव
तारामण्डल रोड-गोरखपुर,273017
फोन: 09451347673, ई मेल ाण्कमअजतपचंजीप/हउंपसण्बवउ
ईमेल - ाण्कमअजतपचंजीप/हउंपसण्बवउ
Wednesday, June 30, 2010
Thursday, April 22, 2010
‘मै और मेरा समय’
कविता
मै
मेरा घर
किताबे मेरी
मेरे विचार
मैं जो सोचता हूं
मेरा समय
समय में
मैं
समय के बारे में
मैनें यह लिखा ऐसा लिखा वैसा लिखा
उनके बारे में, खिलाफ उनके
लिखा मैंने
स्वार्थ, लोभ, लालच, बाजार,वैश्वीकरण, गरीबी दरिद्रता
सबसे पहले मैने ही किये विचार
उच्चारे तमाम तमाम शब्द-पद
खोजे मैने ही
क्या नहीं कहा मैने
सब तो मैं कह चुका हूं
कहता ही रहा हूं/रहूंगा मैं
जब तक मैं रहूंगा
कहता ही रहूंगा
खोजता ही रहूंगा मैं
इस समय
में
अपनी जगह
में अपना हिस्सा
में अपना अवकाश
और में अपनी.....
अपनी... में
के लिए लड़ता ही रहूंगा
मैं
----- कपिलदेव
22.04.010
मै
मेरा घर
किताबे मेरी
मेरे विचार
मैं जो सोचता हूं
मेरा समय
समय में
मैं
समय के बारे में
मैनें यह लिखा ऐसा लिखा वैसा लिखा
उनके बारे में, खिलाफ उनके
लिखा मैंने
स्वार्थ, लोभ, लालच, बाजार,वैश्वीकरण, गरीबी दरिद्रता
सबसे पहले मैने ही किये विचार
उच्चारे तमाम तमाम शब्द-पद
खोजे मैने ही
क्या नहीं कहा मैने
सब तो मैं कह चुका हूं
कहता ही रहा हूं/रहूंगा मैं
जब तक मैं रहूंगा
कहता ही रहूंगा
खोजता ही रहूंगा मैं
इस समय
में
अपनी जगह
में अपना हिस्सा
में अपना अवकाश
और में अपनी.....
अपनी... में
के लिए लड़ता ही रहूंगा
मैं
----- कपिलदेव
22.04.010
लेबल:
kavita
Thursday, February 25, 2010
इस तरह जो बचा रहेगा वह
यहीं से शुरू होगा इतिहास
पिछला बाकी सारा पीछे छूट जाएगा
पलट दिया जाएगा पन्ना
सरकारें
बदल दी जाएंगी
स्मृतियां रहेंगी - मगर रोती हुई - किसी कोने या कूडेदान में
जो बचा रहेगा वह
इतिहास नहीं इतिहास के बचे होने का शोक होगा
बस, शोक ही बचा रहेगा
शोक का इतिहास नहीं बचा रहेगा
गांधी का नाम ले लेकर हलकान हो रहे लोगांे
सोचो, क्या है तुम्हारा संकल्प
किस श्रेणी के डिब्बे में यात्रा कर रहा है तुम्हारा स्वाभिमान
जबकि तुम्हें पकड़ लिया गया है बिना टिकट यात्रा के जुर्म में पहले ही
तुम्हारी गुप्त आकांक्षाओं के किसी प्लेटफार्म पर
बेचारा यह मजबूर समय
जिन हाथों में अपने भविष्य की रेखाएं खोज रहा है
उन हाथों नें तो पहले ही
खूनी चेहरेां की कालिख छिपाने का ठेका ले लिया है
‘समय’ नें शर्म का सामना करना सीख लिया है
अब उसकी चेतना धूप के लिए किसी सूरज का इंतजार नहीं करती
अब तो कुछ शब्द ही काफी हैं
वैसे धूप में धूप बची भी कहां है
जहां होती थी धूप
वहां रोशनी के नाम पर अब
गर्व से तनी एक तर्जनी है
जिसके नाखून पर चमक रहा है
अपने ही विरोध में विश्वास मत डाल चुकने का निशान!
अब तो
पानी पर छाई हरी हरी काई हरेपन का
मिसाल बन गई है जैसे-
हरीतिमा को स्थगित कर काई का हरापन हो रहा है पर्यावरणीय
तितलियों,
फूलों और इंद्रधनुष के रंगांे का रक्त निचोड लिया गया है
दरबारों में सज्जित
स्वस्तिक छाप अल्पनाओं पर
सजाया गया अमृत कलश अस्ल में तो
देवासुर संग्राम का विष-कुम्भ है
जिसका स्वर्ण-मुख-दीप
रंगों के रक्त से प्रदीप्त हो रहा है।
इतिहास में
यह नवीनतम उपयेाग है
रंगों का
इसतरह
तितलियों,फूलों और इंद्रधनुष की आत्माओं की पहचान को
पहचान की सूली पर टांग दिया गया है अैार
हुक्मरानों नें रंगों से साठ गांठ कर ली है
अब रंग ही लिखंेगे हमारी पहचान
हमें रंगो से पहचाना जाएगा-
उन रंगों से, जो
तितलियों और फूलों और इंद्रधनुष की हत्या और अनन्त पाप
के खनिज हैं
संविधान के कंगूरों पर लहराता
केसरिया-लाल-सफेद- हरा-पीला-नीला
ही अब
वर्तमान की रगों में बहते रंगों का इतिहास माना जाएगा
तितलियों
फूलों और
इंद्रधनुष के रंगों का नया इतिहास!
लिखा जाएगा
इस तरह।
20.02.010
पिछला बाकी सारा पीछे छूट जाएगा
पलट दिया जाएगा पन्ना
सरकारें
बदल दी जाएंगी
स्मृतियां रहेंगी - मगर रोती हुई - किसी कोने या कूडेदान में
जो बचा रहेगा वह
इतिहास नहीं इतिहास के बचे होने का शोक होगा
बस, शोक ही बचा रहेगा
शोक का इतिहास नहीं बचा रहेगा
गांधी का नाम ले लेकर हलकान हो रहे लोगांे
सोचो, क्या है तुम्हारा संकल्प
किस श्रेणी के डिब्बे में यात्रा कर रहा है तुम्हारा स्वाभिमान
जबकि तुम्हें पकड़ लिया गया है बिना टिकट यात्रा के जुर्म में पहले ही
तुम्हारी गुप्त आकांक्षाओं के किसी प्लेटफार्म पर
बेचारा यह मजबूर समय
जिन हाथों में अपने भविष्य की रेखाएं खोज रहा है
उन हाथों नें तो पहले ही
खूनी चेहरेां की कालिख छिपाने का ठेका ले लिया है
‘समय’ नें शर्म का सामना करना सीख लिया है
अब उसकी चेतना धूप के लिए किसी सूरज का इंतजार नहीं करती
अब तो कुछ शब्द ही काफी हैं
वैसे धूप में धूप बची भी कहां है
जहां होती थी धूप
वहां रोशनी के नाम पर अब
गर्व से तनी एक तर्जनी है
जिसके नाखून पर चमक रहा है
अपने ही विरोध में विश्वास मत डाल चुकने का निशान!
अब तो
पानी पर छाई हरी हरी काई हरेपन का
मिसाल बन गई है जैसे-
हरीतिमा को स्थगित कर काई का हरापन हो रहा है पर्यावरणीय
तितलियों,
फूलों और इंद्रधनुष के रंगांे का रक्त निचोड लिया गया है
दरबारों में सज्जित
स्वस्तिक छाप अल्पनाओं पर
सजाया गया अमृत कलश अस्ल में तो
देवासुर संग्राम का विष-कुम्भ है
जिसका स्वर्ण-मुख-दीप
रंगों के रक्त से प्रदीप्त हो रहा है।
इतिहास में
यह नवीनतम उपयेाग है
रंगों का
इसतरह
तितलियों,फूलों और इंद्रधनुष की आत्माओं की पहचान को
पहचान की सूली पर टांग दिया गया है अैार
हुक्मरानों नें रंगों से साठ गांठ कर ली है
अब रंग ही लिखंेगे हमारी पहचान
हमें रंगो से पहचाना जाएगा-
उन रंगों से, जो
तितलियों और फूलों और इंद्रधनुष की हत्या और अनन्त पाप
के खनिज हैं
संविधान के कंगूरों पर लहराता
केसरिया-लाल-सफेद- हरा-पीला-नीला
ही अब
वर्तमान की रगों में बहते रंगों का इतिहास माना जाएगा
तितलियों
फूलों और
इंद्रधनुष के रंगों का नया इतिहास!
लिखा जाएगा
इस तरह।
20.02.010
लेबल:
kavita
Sunday, February 14, 2010
‘प्रेम का जंगल’
वियतनामी कहानी ‘प्रेम का जंगल’
लेखक: ट्रंग ट्रंग डिन्ह
वियतनाम के एक विद्यालय में अंग्रेजी की शिक्षिका ‘वूआन ली ’ नंे यह कहानी मूल वियतनामी से अंग्रेजी में अनूदित करके, भेजा है,। उनके ही आग्रह पर मैनें इसका अ्रग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया है। हिन्दी में अनुवाद के दौरान कहानी के कईस्थलों का आशय स्पष्ट करने में उन्होंने अलग से भी मेरी सहायता की है। ली वियतनामी ओैर अंग्रेजी - दोनों भाषाओं में कविताएं लिखती हैं। अमरीकी सेनाओं द्वारा वियतनाम के गांवों में गिराए गये नापाम बमों का खौफ, अपने बचपन के दिनों में, उन्होंने खुद भी झेला है । -अनुवादक
( 21सितम्बर 1949 को जन्मे इस कहानी के लेखक ट्रंग ट्रग डिन्ह हाई स्कूल तक पढ़ाई करने के बाद वियतनाम की सेना में भर्ती हो गये थे । टे-गुवेन के मोर्चे पर अमरीकी फौजों का मुकाबला किया। वहीं सेना में रहते हुए एक आर्ट्स कालेज से ग्रेजुएट तक की शिक्षा प्राप्त की।
कई कविता पुस्तकें, उपन्यास, कहानीसंग्रह और फिल्म स्क््िरप्ट प्रकाशित। साहित्य और कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम के लिए वियतनाम लेखक संघ के प्रतिष्ठित पुरस्कार से पुरस्कृत डिन्ह को वर्ष 2000 के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। फिल हाल श्री डिन्ह वियतनामी लेखक संध के प्रकाशन संस्थान के निदेशक का पद सम्हाल रहे हैं- वूआन ली )
एच-15 यूनिट के एक भूतपूर्व कामरेड से ‘थिन्ह’ की मृत्यु का समाचार सुन कर ‘की-सोर-हाइ’ का दिल बैठ गया। अमरीकी फौजों द्वारा आसमान से गिराई गई ‘डाईआक्सिन’ नामक जहर की चपेट में आ जाने से थिन्ह की मौत हो गई थी। हाइ और थिन्ह दोनों वर्षो तक एच-15 यूनिट में साथ रह चुके थे। थिन्ह और हाइ एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे। यूनिट से वापस आ जाने के बाद हाइ लगभग रोज ही थिन्ह को सपनों में देखती थी। वह देखती कि थिन्ह नें उसे अपनी बाहों में भर लिया है। लेकिन वह चूमने के लिए जैसे ही आगे बढ़ता, कि अमरीकी बमवर्षक जहाजों का शोर उसे भयभीत कर देता ओैर वह हाइ को छोड कर दूर भाग जाता। हाइ उसका पीछा करना चाहती। लेकिन उसे लगता कि उसके पांव पत्थर की तरह जड़ हो गये हैं। वह अपनी जगह से हिल तक नहीं पाती।
नींद टूटने पर भी लगता कि उसके पैर उठ नहीं पा रहे हैं। कभी उसे लगता कि थिन्ह शायद अमरीकी सेना पर आक्रमण के लिए जंगल में ,झाड़ियों के पीछे घात लगा कर बैठा है। यह सेाचते हुए उसे फिर नींद आ जाती और सपने में वह देखती कि अपनी बाहों में भर कर थिन्ह उसे एक झरने के पास ले गया है। झरना सूखा है। वहां रंगविरंगी तितलियों का एक स्कूल है। उन दोनेां की वहां मौजूदगी नें उस स्कूल के वातावरण को अनजाने ही डिस्टर्ब कर दिया है। हाइ को अचानक लगता कि वह पंख की तरह एक दम हल्की हो गइ्र्र है ओैर थिन्ह को वहीं अकेला छोड़ तितलियों के झुण्ड में शामिल हो गई है।
कभी वह देखती कि थिन्ह किचेन के दरवाजे पर लकड़ी के मोर्टार पर बैठे बैठे उसे देख रहा है। उसके हाथ में एक किताब है। वह उसे ।ठब्क् पढ़ा रहा है। थिन्ह के मुंह से अक्षर रंगीन तितलियों की तरह निकल कर उसके ऊपर रंगों की बौछार कर रहे हैं। सपने में उसे यह सब इतना मजेदार लगता कि वह खुशी से चीख पड़ना चाहती। लेकिन उसे लगता कि उसके होंठ मानों सिल गये हैं और चीख उसके गले में ही घुट कर रह गयी है। घुटन के मारे उसकी नींद उचट जाती और सपने का यह दृश्य उसे उदास कर जाता। घीरे धीरे नींद आने पर वह फिर उसी तरह सपने देखने लगती। वह देखती कि थिन्ह ओैर उसके प्रेम का जंजालों से भरा दृश्य एक बार फिर उसके सामने है। एक बार उसने देखा कि थिन्ह की पीठ पर वजनदार पैपून लदा है, जिसकी वजह से उसके कंधे झुके हुए हैं। कभी वह देखती कि खूब तेज धूप हुई है और थिन्ह अमरीकी सेना द्वारा गिराए गए नापाम बम से जलते हुए जंगल मे दौड़ रहा है। जबकि आग की लपटें आसमान छू रही हैं। एक बार तो हाई नें सपने में देखा कि आग की लपटों में थिन्ह किसी विस्फोटक की तरह तड़-तड़ की आवाज के साथ जल रहा है। आग की लपटों से घिरा उसका जिस्म इमा मो... के किनारे रेत पर लुढ़क रहा है। सपने में ही वह सोचती, ‘‘हे ईश्वर ! यह नहीं हो सकता- सपनें में वह जोर से चिल्ला पड़ती- थिन्ह !!! पानी में कूद जाओ। पानी तुम्हारे शरीर पर लगी आग को बुझा देगा।’’ वह देखती कि थिन्ह पानी में कूद गया है। अब चश्मे का पानी हरहरा कर घाट पर बढ़ा आ रहा है, जहां वह अलस्सुबह खाना पका कर थिन्ह के आने का इंतजार कर रही है। तभी अचानक एक अमरीकी बम गिरा है और सारे बर्तन तितर-बितर हो उठे हैं। वह और थिन्ह दोनों बम से फिंक कर जंगल की चोटी पर जा पहुंचे हैं। खांसी के मारे थिन्ह का बुरा हाल है। कभी-कभी वह देखती कि थिन्ह धान के हरे भरे खेतों के ऊपर हवा में उड़ रहा है। उसका समूचा बदन नंगा है। वह नीचे लौकी के फूंलों को चुन रही है। तभी, अचानक, एक अमरीकी बमवर्षक जहाज ने आसमान में जहर बिखेर दिया है। सारा आसमान धुंएं से भर गया है ओैर थिन्ह धुंएं में धिर गया है। उसके पास अपना मुंह ढकने के लिए एक गीला कपड़ा तक नहीं है। वह देखती कि थिन्ह उसकी आंखेंा के सामने ही धूंऐ से घुट कर मर रहा है। हाइ मारे डर के चिल्ला पड़ती। थिन्ह, हाइ को ऊपर खींचने के लिए हाथ बढ़ाता । लेकिन उसके पैर जैसे जड़ हो जाते, हाथों में मानो जोर नहीं रह जाता। मजबूर होकर वह सिर्फ चिल्लाता- भागो !! भागो्््!!
एच-15यूनिट के तमाम दूसरे जवानेां की तरह, पहाड़ के जंगल से लकड़ी, मैनियोक और सब्जी आदि ला कर हाइ को मुहैय्या करने का काम थिन्ह को भी करना पड़ता था। मगर हाइ को, लम्बा ओैर दुबला थिन्ह, औरों से काफी अलग तरह का इंसान लगता था। उसे उसमें ऐसा कुछ खास दिखता था जो औरों में न था। वह उसे अंग्रेजी की वर्णमाला सिखाता था। उसके पढ़ाने का ढंग बहुत अनाड़ी था। मगर हाइ का दिल उसे बहुत आसानी से सीख लेता। थिन्ह अकसर खराब तरीके से भी बात करता मगर हाइ को उसकी हर बात प्यारी लगती। उसका बेतकल्लुफी भरा व्यवहार हाइ को भावुक बना देता। वह इतना लम्बा था कि रसोई घर का दरवाजा उसके लिए बहुत नीचा लगता। जबकि औेरों के लिए ठीक था। जब भी वह पैपून आदि भारी सामान अपनी पीठ पर लाद कर लाता तो उतारने के लिए पहले तो उसे घुटनों के बल पर झुकना पड़ता, तब वह रसोई में घुस पाता और अपने पीठ पर लदा पैपून किसी तरह से जमीन पर रख पाता। हाइ थिन्ह को बेतरह चाहती थी। लेकिन उसके पास अपने दिल की बात कह पाने का साहस नहीं था। उसनें अपने हाथों से थिन्ह के लिए एक अलमारी तैयार कर दी थी ताकि पीठ पर लदा सामान उतारने के लिए उसे घुटने के बल झुकने की तकलीफ से बचाया जा सके। लेकिन थिन्ह के मन में हाइ के लिये इसतरह का कोई भाव नहीं था। वह तो उसे अपनी छोटी बहन की तरह ही समझता था और वैसा ही व्यवहार करता था। यहां तक कि वह उसके बालों तक को सहला देता। उसकी हर चीज की प्रशंसा करता। उसे इस बात की तनिक परवाह न थी कि हाइ एक शादी-शुदा औरत है और उसके एक बच्चा भी है। वह जब भी काम से वापस आता तो हाइ के लिए कुछ न कुछ उपहार जरूर लाता। कभी किराक लकड़ी से बना ब्रेसलेट तो कभी अमरीकी जहाजों की स्टील से बनी कंघी !
एक बार उसने उपहार के रूप में हाइ को लकड़ी के दानों से बना एक माला दिया। यह इतना कीमती ओैर दुर्लभ था कि हाइ ने ऐसी माला अपने पूरे जीवन में पाने की कभी कल्पना भी नही की थी। ‘‘ अगर यह जंगली किराक लकड़ी से बना हुआ है तो यह इतना रंगीन कैसे हो सकता हैं?’’- हाइ नें थिन्ह से पूछा था। तब थिन्ह नें छोटे छोटे औैजारों से बना एक उपकरण,एक छोटा ड्रिल और पालिश दिखाया। उसने बताया था कि पीढ़ियों से ये चीजें अपने बाप दादा से विरासत मंे मिलती चली आ रही हैं। ठीक उसी तरह जैसे कि जारी जाति(दक्षिण वियतनाम का एक अल्पसंख्यक समुदाय) के लोग बंदूक और चाकू के बिना रह नहीं सकते, वैसे ही हमारे लिये ये उपकरण हंै।
चू मो(एक पहाड़) का अभियान खत्म हो चुकने के बाद एच-15 यूनिट वापस आ चुकी थी। मगर थिन्ह नहीं लौटा था। थिन्ह के बिना हाइ का किसी काम में मन नहीं लगता था। वह खाना बनाने का काम भूल कर यहां वहां गायब हो जाती। कामरेड उसे खोजा करते। वह थिन्ह की याद में खोई कभी कही तो कभी कहीं अन्यमनस्क सी बैठी मिलती। मन ही मन वह थिन्ह से कहती,‘‘अगर दूसरे कामरेडों के साथ तुम नहीं आ सकते थे तो मेरे लिए कम से कम एक चिटठी ही छोड़ दिये होते.... तुम तो हमेशा कुछ न कुछ उपहार दिया करते थे...’’ बाद में उसे पता चला था कि थिन्ह यूनिट के काम से रूका हुआ है। वह मरा नहीं है। जब वह लौट कर आया तो हाइ ने महसूस किया कि वह अब पहले वाला थिन्ह नहीं है। हाइ से वह बहुत कम मिलता। पहले की तरह उसे कोई उपहार भी वह अब नहीं देता था। हाइ उसके बदले हुए व्यवहार से बहुत दुखी और चुप-चुप रहने लगी थी। न उससे बात करती और न ही उसकी तरफ देखती । थिन्ह के साथ उसके सम्बन्धों को ले कर कामरेडों के मजाकों को भी वह अब अनसुना कर देती थी। अब जब थिन्ह सब्जी या कोई अैार सामान ले कर रसोई में आता तो वह किसी काम में व्यस्त होने का बहाना करने लगती। उसने अपने मन को समझाया, ‘‘अब हमे इसकी परवाह नहीं करनी है।’’ एक बार थिन्ह अपनी गीली कमीज सुखाने के लिए रसोई में आग के पास कुछ देर तक रूका रहा। हाइ ने इस काम में उसकी कोई मदद नहीं की। एक वक्त वह भी था जब वह खुद उसके कपड़े सुखाया करती थी। लेकिन इस बार ?.... नहीं....। अब वे दोनो बदल गये थे। तभी मोैका देख कर थिन्ह नें पूछा, ‘‘ क्या तुम मुझसे नाराज हो ?’’ हाइ ने कोई उत्तर नहीं दिया। हां, चूल्हे की जलती आग मे उसने कुछ और लकड़ियां जरूर डाल दी। ओैर उसके बाद आर्मी पाट में पानी भर कर उसमें सूअरों का खाना तैैयार करने के लिए मैनियाक के टुकडों को मिलाने लगी थी।
यूनिट में हर किसी को यह बात मालूम थी कि थिन्ह कुंवारा है। जबकि हाइ को-पा-हेंग की पत्नी है और उसके एक बच्चा भी है। बच्चा जब 3 वर्ष का हो गया तो हेंग नें हाइ को गुरिल्ला यूनिट में काम करने से मना कर दिया था। और उसे वापस घर भेज दिया था। लेकिन कुछ महीने बाद जब वह घर गया तो हाइ को लड़ाकू क्रांतिकारियों के कैम्प में ले कर आ गया, जहां वह जिला कमिटी के बेस-कैम्प मे रसोइये का काम करने लगी थी। वहां करीब छ महीना ही उसने काम किया होगा कि हेंग उसे लेकर सैनिक बटालियन की मुख्य टुकड़ी- एच-15 यूनिट- चला आया। इस यूनिट के सभी कामरेड क्योंमिक शिक्षित और अनुशासन प्रिय उत्तरी वियतनाम के निवासी थे ,इसलिए हेंग ने सोचा कि हाइ को इस यूनिट में ही रखना पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।
हाइ ने हेंग को पहली बार अपने गांव में देखा था। हेंग का दल मुक्ति अभियान में गुरिल्ला नौजवानों की भर्ती के लिए उसके गांव में आया था। तब हाइ हेंग के गंभीर व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी। वह उसे मन ही मन चाहने लगी थी। हाइ को मालूम हुआ कि हेंग शादी-शुदा है और उसके दो बच्चे भी हैं। मगर जब उसने जाना कि अमरीकी सेना के अत्याचारी दबाव के नाते उसकी पत्नी को उसे छोड़ कर दुश्मन की सेना के किसी सिपाही के साथ चले जाना पड़ा है, तो वह हेंग को ओैर भी अधिक चाहने लगी थी। प्ली-डिट गांव के गुरिल्लाओं को यह जान कर बड़ी जलन होने लगी कि हाइ और हेंग एक दूसरे को चाहते हैं। पहले तो हाइ उसे अंकल कह कर बुलाती थी। लेकिन कुछ ही दिनों बाद भाई साहब कहने लगी। फिर बाद में तो दोनों इतना घुलमिल गये कि बिना किसी झिझक या शर्म के एक दूसरे से लिपट भी जाया करते थे। हाइ के माता-पिता को इसकी खबर नहीं थी। जिला कमिटी के सीनियर सिपाहियों ने जब सुना कि उनका लीडर अपने से काफी कम उम्र की एक गुरिल्ला लड़की से प्यार करता है तो उन्हंे भी यह अच्छा नहीं लगा। पार्टी सेल की बैठक में भी इसकी चर्चा गर्म रही। किसी ने हाइ से पूछा, ‘‘ क्या यह उचित है?’’ ‘‘ इसमें अनुचित जैसा तो कुछ भी नहीं है - हाइ ने कहा-अगर वह मुझे प्यार करता है तो इसमें बुराई क्या है?’’ इसके कुछ ही दिन बाद दोनों ने शादी कर ली थी। उनके एक बच्चा भी हुआ था। बच्चा पैदा होने के बाद हाइ दिन प्रति दिन सुंदर दिखने लगी थी। युद्ध के आतंक का उस पर कोई असर नहीं था। उसका रंग काफी निखरा हुआ और होठ रसीले दिखने लगे थे। उसके रूप का आकर्षण दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा था। उसकी आवाज में पहले की अपेक्षा दसगुना मिठास भर गई थी। पहले इक्का-दुक्का लोग ही उसकी तरफ ध्यान देते थे लेकिन अब तो हर कोई उसके रूप का दीवाना था। जंगल में खिले हुए हजार हजार फूलों में वह अब एक ऐसा खूबसूरत फूल थी जिस पर जाकर सभी की आंखे ठहर जाती थी। उसकी निखरी हुइ्र्र सुंदरता ने उसके पति हेेंग को चिंता में डाल दिया था। हेंग नें मन ही मन अपने आप से कहा, ‘‘एक ही रास्ता है-, या तो जिला सशस्त्र बल का नेतृत्व छोड़ कर पत्नी और बच्चों के साथ गांव चला जाऊं या फिर हाइ एच-15यूनिट की सदस्यता छोड़ कर बच्चे के साथ वापस गांव चली जाय।’’ तमाम ना नुकुर के बाद अंततः हाइ को ही यूनिट छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा। हाइ को गावं भेज कर, उसने उसके वहां आराम से रहने का सारा इंतजाम कर भी कर दिया। लेकिन, हाइ को गांव भेज देने के बाद भी हेंग निश्चिंत नहीं हो सका था। अब भी उसका मन काम में नहीं लगता था। उसकी उलझन को महसूस करते हुए जिला कमिटी नें उसे सलाह दी कि वह हाइ को यही लेता आये, उसे कुक के काम पर लगा दिया जाएगा। कमिटी के सदस्यों ने विचार बनाया कि पहले हाइ जिला कमिटी के लिए कुछ दिन कुक का काम करे। फिर उसे उच्च शिक्षा के लिए और फिर उसके बाद डाक्टरी पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया जाएगा। लेकिन, हाइ को जिला कमिटी में वापस ला कर भी हेंग निश्चिंत नहीं हो पाया था। क्योंकि यहां के कामरेड, किसी भी जिला समिति के कामरेडों से, अधिक सुंदर, आकर्षक, हंसमुख, सुसभ्य और स्वस्थ थे। उन्हें सशस्त्र यूनिट के कामरेडों की तरह युद्ध में भी नहीं जाना पड़ता था। इस तरह उनका जीवन काफी सुरक्षित और आसान भी था। ऐसी स्थिति में हेंग भला निश्चिंत कैसे रह सकता था? संयोग से उसी समय वहां एच-15 यूनिट भी तैनात की जा रही थी। हेंग नें इस यूनिट के लीडर हान से जब अपनी बात कही तो वह हाइ को अपनी यूनिट का न केवल कुक बल्कि मैनेजर भी बनाने के लिए तैयार हो गया। पहले तो हाइ वहां जाने के लिए तैयार न हुई। क्योंकि वह जानना चाहती थी कि ‘‘यहां से उसे क्यों वहां भेजा जा रहा है। जबकि यहां अभी उसनें अपना काम शुरू ही किया है।’’
-- हेंग ने कहा,‘‘तुम क्रांति के अभियान में शामिल हो, इसलिए तुम्हें आदेश का पालन करना होगा।’’
--‘‘लेकिन मेरे बेटे की देखभाल कोैन करेगा ?’’ हाइ ने चिंतित स्वर में अपने पति हेग से पूछा।
--‘‘ वह अपने नाना-नानी और मेरे पास रहेगा। मैं महीने-दो महीने में जा कर उसकी देख-भाल करता रहूंगा।’’ हेग नें कहा।
-- हाइ नें जोर दे कर कहा, ‘‘पहले वादा करो कि एच-15 यूनिट में जाने के बाद भी तुम मुझे अपने बेटे के पास जाने दोगे।’’ उसे छोड़ कर रहना मुझे बहुत खलेगा। मैं उसे बहुत मिस करूंगी।’’
-- ‘‘ हम लोग क्रांतिकारी अभियानों में लगे हुए लोग हैं। हमें ‘मिस करने’ जेैसे शब्दों से हर हाल में परहेज करना चाहिए। अब मुझे सब इंतजाम करने दो।’’, हेंग नें कहा।
-- ‘‘ हे ईश्वर ! तुम हमेशा यही दुहराते हो- ‘‘ हमे हर हाल में’...... ’’ हाइ ने मन मे कहा।
अपने प्यारे बेटे और जानी-समझी टुकड़ी को छोड़नें के निर्णय नें उसे दुखी कर दिया था। लेकिन वह कर भी क्या सकती थी। आदेश का पालन तो करना ही था। आखिर तो यह क्रांतिकारी अभियान के हित में लिया गया एक निर्णय था। उसे भला क्या पता था कि यह पार्टी का नहीं, हेंग का अपना निर्णय था। मगर हाइ के एच-15यूनिट में चले जाने के बाद भी हंेग की चिंता दूर नहीं हुई थी। हेंग के मन में यह आशंका घर कर गई थी कि कोई घात लगाए बैठा है और मोैका मिलते ही हाइ को ले कर उड़ जाएगा। इसलिए अब भी वह पूरी तरह से निश्चिंत नहीं था। अब वह सोचने लगता कि उत्तरी प्रांत के सैनिक स्मार्ट और पढ़े लिखे हैं। हो सकता कि मेरी वाईफ में उनकी रूचि न हो। लेकिन बहुत मुमकिन है कि वही किसी प्रेम कर बैठे। और यही हुआ भी। हाइ यहां आ कर पूरी तरह बदल गई थी। सेना की वर्दी में वह दिनों दिन स्वस्थ और सुंदर दिखने लगी। अब वह सलीकेदार मीठी भाषा में बातें करती। कैम्प मे रहते हुए वह कंघी, शीशा, तमाम तरह की वैसलीन और परफयूम रखने लगी थी। उसने कमरे की दीवालों पर सुंदर संुदर चित्र भी चिपका रखे थे। अब वह वियतनामी भाषा ‘किन्ह’ पहले से काफी अच्छा बोलना सीख गई थी। सब कुछ जानते हुए भी हेंग यह पूछ नहीं पाता था कि कौन है उसका टीचर। उसे क्या पता था, कि एक आशंका, जो हमेशा उसके मन में बनी रहती थी, वह अब सच होने जा रही थी।
हाइ की नजर में हेंग अब पहले जैसा स्मार्ट और दिव्य नहीं रह गया था। अब वह हमेशा बात बात पर लड़ाई झगड़ा करता रहता। एच-15यूनिट का कैम्प जहां लगा था, वह एक घना जंगल था। रात मे एकदम सन्नाटा छा जाता था । ऐसा सन्नाटा कि आप दूर बहते हुए झरने की आवाज सुन लें। यहां तक कि किसी सूखी टहनी के टूट कर गिरने की ‘खुट’सी आवाज या मच्छरदानी के बाहर मच्छरों की भिन भिन भी......। जब भी हेंग एच-15यूनिट के कैम्प में अपनी पत्नी हाइ से मिलने आता, तो उसके पास शराब की एक बोतल होती। बिना बोले, बिना बात किये,हाइ के सामने चुपचाप बैठ कर वह शराब पीता रहता। हाइ को भी आफर करने की बात वह सोचता तक नहीं। नशे में वह हाइ के साथ जैसे बलात्कार पर उतारू हो जाता। उसके कपड़ों को उतार फेंकता और उसके नंगे बदन को टार्च की रोशनी में निहारता। मगर, कामातुर हो कर नहीं। वह तो उसके बदन पर अनजान मर्दो के छोड़े हुए निशान ढूंढ़ता। पहले तो वह सोचती थी कि इसतरह वह उसके साथ हंसी-मजाक कर रहा है। इसलिए वह जोर जोर से हंसती और मजाक में कहती,‘‘अब ऐसा नया क्या है जिसे तुम देख रहे हो। सब तो वही है, पुराना-पहले जैसा।’’ मगर इतना कहने पर भी हेंग बोलता कुछ न था। एक दिन, जब वे दोनों काम-क्रिया में चरम पर पहुंचने पहुंचने को थे,तभी वह अचानक उठकर टेण्ट के बाहर भाग गया। वह एक अंधेरी रात थी। इतनी अंधेरी कि जैसे किसी नें स्याही उड़ेल दी हो। कुछ ही क्षण बाद वह फिर वैसे ही चुपचाप वापस आ गया और फिर उसे अपने आलिंगन मे कस लिया। मगर अबतक वह शांत और ठंढी हो चुकी थी। हाइ को संभेाग क्रिया मे ऐसी नीरसता का अनुभव इसके पहले नहीं हुआ था। वह अब बलात्कार करने पर उतारू हेा गया था। खिलौने की तरह हाइ को कभी नीचे पटक देता और कभी आसमान में उछाल देता। ऐसा एक बार नहीं,दो बार नहीं,यह आए दिन की बात हो गई थी।
यह सब करते-करते एक दिन जब कुछ न सूझा तब उसने कहा, ‘‘अब आज से मैं तुम्हारा पति नहीं हूं। समझी ?’’
‘‘नही-,हाइ उत्तर दिया-अब आज से मैं तुम्हारी बीवी नहीं हूं। अब मुझे अकेला छोड़ दो।’’
वह चीखा,‘‘मेरी बीवी नहीं हो? तो किसकी हो?’’
‘‘ किसी की नहीं’’ हाइ नें कहा।
हेंग नें के-59 राइफल उठा लिया।
‘‘ मुझे मार देना आसान हैै। लेकिन सोचो कि तुमसे पैदा हुए बच्चे की परवरिश कोैन करेगा- हाइ नें कहा, ‘‘अपने बच्चे की देखभाल के लिए अब मैं घर जाऊगीं।’’
अगली सुबह हेंग नें इस मसले पर यूनिट लीडर हान से विचार विमर्श किया तो हान नें उसे हाइ को यूनिट से ले जाने की इजाजत दे दी थी । इसके बाद हेंग उसे ले कर घर वापस चला आया। हेंग नें सोचा कि अब चिंता की कोई बात नहीं। हाइ अब एच-15 यूनिट के किसी कामरेड से मिल नहीं पाएगी। लेकिन हुआ ठीक इसके उल्टा। थिन्ह से अलग होने के बाद जेैसे जैसे दिन बीतते गये थे हाइ के दिल में उसके प्रति प्यार बढ़ता गया। थिन्ह को वह जितना ही याद करती, हेंग उतना ही ईष्र्या से भर जाता। जितना ही वह डाह करता, हाइ उतना ही शांत रहती। नतीजा यह हुआ कि दोनेां में आए दिन झगड़ा होने लगा। तंग आकर ग्रामप्रधान नें हेंग पर ग्राम देवता को सूअर की बलि चढ़ाने का जुर्माना ठोक दिया था।
अगले दिन, ग्रामदेवता को बलि चढ़ाने के बाद, हेंग अपने यूनिट के लिए रवाना हो गया। उसे ‘चू मो’ मोर्चे पर लड़ाई का प्लान तैयार करना था। इसबार उसकी टुकड़ी और एच-15 यूनिट को एक साथ मिलकर चीओ-रीओ (एक प्रांत) क्षेत्र को लिबरेट करने के लिए कूच करना था। थिन्ह के अग्रिम दस्ते को जिला सशस्त्र दस्ते की तैनाती के लिए उचित इलाके का पता करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तीन ग्रामीण साथियों औैर पुई बी को गुप्त गति विधियों के लिए लगा दिया गया था। संयोग से, हाइ से थिन्ह के अग्रिम दस्ते की भेंट हो गई। थिन्ह और हाइ दोनेंा एक दूसरे को पा कर चकित रह गये थे। गांव के गुरिल्ला जवानों की ओर से दी गई पार्टी में थेाड़ा पी लेने के कारण थिन्ह उस वक्त वह कुछ कुछ नशे में था।
यह जान कर कि थिन्ह नशे में है, कैम्प में लौटने पर,हाइ उसके लिए थोड़ा चिकेन सूप लेकर आई । उस समय दोनेां को ऐसा लगा था कि भगवान उनपर काफी मेहरवान है और भगवान की कृपा से ही दोनों की भेंट हो पाई हेै। बाकी दोनो कामरेड थिन्ह और हाइ के मुहब्बत से परिचित थे। इसलिए वे दोनेा कुछ ज्यादा ही देर तक गांव के जवानों के साथ पीने और खाने में समय गुजारते रहे। काफी दिनों के बाद दोनों मिले थे। इसलिए एकांत पाते ही दोनेां कस कर लिपट गये। दोनों एक दूसरे पर चुम्बनों की बैाछार करते रहे। वे इस कदर लिपट गये थे जैसे कि अब कोई भी ताकत उन्हे जुदा नहीं कर सकती। दोनो प्रेम में पागल हो रहे थे। हाइ, थिन्ह की बाहों में खुद को खो देने के लिए बेताब हो रही थी। और थिन्ह था कि रोमांच के अतिरेक से पत्ती की तरह कांप रहा था। उसे जाने क्या अचानक सूझा कि जल्दी जल्दी कपड़े पहन कर जंगल की तरफ भाग गया। हाइ से बिना एक भी शब्द कहे। चुपचाप। उसके बाद तो थिन्ह और उसका ग्रुप युद्ध के अभियान पर चला गया...।
हाइ के दोनों प्रेमियों में से अब कोई भी उसके पास नहीं रह गया था।
हाइ को छोड़ने के बाद हेंग नें जिला सशस्त्र बल की एक नर्स से रिश्ता बना लिया था,जिससे एक बच्ची थी। लेकिन कुछ ही दिन बाद वे दोनों चू मों पहाड़ पर दुश्मनों से लड़ते हुए मारे गये थे। उनकी मृत्यु का समाचार सुन कर हाइ यूनिट से उसकी बच्ची को अपने पास उठा लाई थी। अब उसके बेटे को एक बहन भी मिल गई थी। हाइ ने हेंग की बच्ची के नाम में अपना कुल-नाम भी जोड़ दिया। अब उसका नाम था- की-ओर हाइ-लिएन। धीरे धीेरे समय बीतता गया। अब तो उसका बेटा भी सशस्त्र सेना का लीडर बन गया है। और बेटी जिला अस्पताल में डाक्टर ।
ं हाइ की प्रेम कहानी जानने के बाद उसकी बेटी की-ओर-हाइ-लिएन नें थिन्ह की पहली पुण्य तिथि पर हाइ को उसके घर ले जाने के लिए अपने पति से कह कर ट्रेन का टिकट मंगवाया। थिन्ह के घर पहुंचने के बाद उन्हें पता चला कि युद्ध की विभीषिका के खत्म हो जाने के बाद भी, उसके दुष्परिणाम थिन्ह की बीवी का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। युद्ध में अमरीकी डाइआक्सिन जहर से थिन्ह तो मारा ही गया था, उसकी संतानों में भी उस जहर का प्रभाव चला आया है। उसके दोनों बच्चे जन्मजात विकृति से ग्रस्त हैं। थिन्ह की बीवी तो बांस की पतली छड़ी जैसी दुबली और कमजोर है। इतनी कमजोर कि उन अभागे बच्चों की देख भाल भी उसके लिए मुश्किल काम था। यह सब देख कर हाइ को रूलाई फूट पड़ी। उसने अपनी बेटी और दामाद से कहा, इनकी पीड़ा को बांटने के लिये अपनी रिटायरमेंट पेंशन और सैनिक बुक मैं इन्हें दे देना चाहती हूं -जंगल के उस आखिरी ढलान पर, जिसे तुम्हारे अंकिल थिन्ह प्यार का जंगल कहा करते थे ।
अनुवाद: कपिलदेव
लेखक: ट्रंग ट्रंग डिन्ह
वियतनाम के एक विद्यालय में अंग्रेजी की शिक्षिका ‘वूआन ली ’ नंे यह कहानी मूल वियतनामी से अंग्रेजी में अनूदित करके, भेजा है,। उनके ही आग्रह पर मैनें इसका अ्रग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया है। हिन्दी में अनुवाद के दौरान कहानी के कईस्थलों का आशय स्पष्ट करने में उन्होंने अलग से भी मेरी सहायता की है। ली वियतनामी ओैर अंग्रेजी - दोनों भाषाओं में कविताएं लिखती हैं। अमरीकी सेनाओं द्वारा वियतनाम के गांवों में गिराए गये नापाम बमों का खौफ, अपने बचपन के दिनों में, उन्होंने खुद भी झेला है । -अनुवादक
( 21सितम्बर 1949 को जन्मे इस कहानी के लेखक ट्रंग ट्रग डिन्ह हाई स्कूल तक पढ़ाई करने के बाद वियतनाम की सेना में भर्ती हो गये थे । टे-गुवेन के मोर्चे पर अमरीकी फौजों का मुकाबला किया। वहीं सेना में रहते हुए एक आर्ट्स कालेज से ग्रेजुएट तक की शिक्षा प्राप्त की।
कई कविता पुस्तकें, उपन्यास, कहानीसंग्रह और फिल्म स्क््िरप्ट प्रकाशित। साहित्य और कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम के लिए वियतनाम लेखक संघ के प्रतिष्ठित पुरस्कार से पुरस्कृत डिन्ह को वर्ष 2000 के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। फिल हाल श्री डिन्ह वियतनामी लेखक संध के प्रकाशन संस्थान के निदेशक का पद सम्हाल रहे हैं- वूआन ली )
एच-15 यूनिट के एक भूतपूर्व कामरेड से ‘थिन्ह’ की मृत्यु का समाचार सुन कर ‘की-सोर-हाइ’ का दिल बैठ गया। अमरीकी फौजों द्वारा आसमान से गिराई गई ‘डाईआक्सिन’ नामक जहर की चपेट में आ जाने से थिन्ह की मौत हो गई थी। हाइ और थिन्ह दोनों वर्षो तक एच-15 यूनिट में साथ रह चुके थे। थिन्ह और हाइ एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे। यूनिट से वापस आ जाने के बाद हाइ लगभग रोज ही थिन्ह को सपनों में देखती थी। वह देखती कि थिन्ह नें उसे अपनी बाहों में भर लिया है। लेकिन वह चूमने के लिए जैसे ही आगे बढ़ता, कि अमरीकी बमवर्षक जहाजों का शोर उसे भयभीत कर देता ओैर वह हाइ को छोड कर दूर भाग जाता। हाइ उसका पीछा करना चाहती। लेकिन उसे लगता कि उसके पांव पत्थर की तरह जड़ हो गये हैं। वह अपनी जगह से हिल तक नहीं पाती।
नींद टूटने पर भी लगता कि उसके पैर उठ नहीं पा रहे हैं। कभी उसे लगता कि थिन्ह शायद अमरीकी सेना पर आक्रमण के लिए जंगल में ,झाड़ियों के पीछे घात लगा कर बैठा है। यह सेाचते हुए उसे फिर नींद आ जाती और सपने में वह देखती कि अपनी बाहों में भर कर थिन्ह उसे एक झरने के पास ले गया है। झरना सूखा है। वहां रंगविरंगी तितलियों का एक स्कूल है। उन दोनेां की वहां मौजूदगी नें उस स्कूल के वातावरण को अनजाने ही डिस्टर्ब कर दिया है। हाइ को अचानक लगता कि वह पंख की तरह एक दम हल्की हो गइ्र्र है ओैर थिन्ह को वहीं अकेला छोड़ तितलियों के झुण्ड में शामिल हो गई है।
कभी वह देखती कि थिन्ह किचेन के दरवाजे पर लकड़ी के मोर्टार पर बैठे बैठे उसे देख रहा है। उसके हाथ में एक किताब है। वह उसे ।ठब्क् पढ़ा रहा है। थिन्ह के मुंह से अक्षर रंगीन तितलियों की तरह निकल कर उसके ऊपर रंगों की बौछार कर रहे हैं। सपने में उसे यह सब इतना मजेदार लगता कि वह खुशी से चीख पड़ना चाहती। लेकिन उसे लगता कि उसके होंठ मानों सिल गये हैं और चीख उसके गले में ही घुट कर रह गयी है। घुटन के मारे उसकी नींद उचट जाती और सपने का यह दृश्य उसे उदास कर जाता। घीरे धीरे नींद आने पर वह फिर उसी तरह सपने देखने लगती। वह देखती कि थिन्ह ओैर उसके प्रेम का जंजालों से भरा दृश्य एक बार फिर उसके सामने है। एक बार उसने देखा कि थिन्ह की पीठ पर वजनदार पैपून लदा है, जिसकी वजह से उसके कंधे झुके हुए हैं। कभी वह देखती कि खूब तेज धूप हुई है और थिन्ह अमरीकी सेना द्वारा गिराए गए नापाम बम से जलते हुए जंगल मे दौड़ रहा है। जबकि आग की लपटें आसमान छू रही हैं। एक बार तो हाई नें सपने में देखा कि आग की लपटों में थिन्ह किसी विस्फोटक की तरह तड़-तड़ की आवाज के साथ जल रहा है। आग की लपटों से घिरा उसका जिस्म इमा मो... के किनारे रेत पर लुढ़क रहा है। सपने में ही वह सोचती, ‘‘हे ईश्वर ! यह नहीं हो सकता- सपनें में वह जोर से चिल्ला पड़ती- थिन्ह !!! पानी में कूद जाओ। पानी तुम्हारे शरीर पर लगी आग को बुझा देगा।’’ वह देखती कि थिन्ह पानी में कूद गया है। अब चश्मे का पानी हरहरा कर घाट पर बढ़ा आ रहा है, जहां वह अलस्सुबह खाना पका कर थिन्ह के आने का इंतजार कर रही है। तभी अचानक एक अमरीकी बम गिरा है और सारे बर्तन तितर-बितर हो उठे हैं। वह और थिन्ह दोनों बम से फिंक कर जंगल की चोटी पर जा पहुंचे हैं। खांसी के मारे थिन्ह का बुरा हाल है। कभी-कभी वह देखती कि थिन्ह धान के हरे भरे खेतों के ऊपर हवा में उड़ रहा है। उसका समूचा बदन नंगा है। वह नीचे लौकी के फूंलों को चुन रही है। तभी, अचानक, एक अमरीकी बमवर्षक जहाज ने आसमान में जहर बिखेर दिया है। सारा आसमान धुंएं से भर गया है ओैर थिन्ह धुंएं में धिर गया है। उसके पास अपना मुंह ढकने के लिए एक गीला कपड़ा तक नहीं है। वह देखती कि थिन्ह उसकी आंखेंा के सामने ही धूंऐ से घुट कर मर रहा है। हाइ मारे डर के चिल्ला पड़ती। थिन्ह, हाइ को ऊपर खींचने के लिए हाथ बढ़ाता । लेकिन उसके पैर जैसे जड़ हो जाते, हाथों में मानो जोर नहीं रह जाता। मजबूर होकर वह सिर्फ चिल्लाता- भागो !! भागो्््!!
एच-15यूनिट के तमाम दूसरे जवानेां की तरह, पहाड़ के जंगल से लकड़ी, मैनियोक और सब्जी आदि ला कर हाइ को मुहैय्या करने का काम थिन्ह को भी करना पड़ता था। मगर हाइ को, लम्बा ओैर दुबला थिन्ह, औरों से काफी अलग तरह का इंसान लगता था। उसे उसमें ऐसा कुछ खास दिखता था जो औरों में न था। वह उसे अंग्रेजी की वर्णमाला सिखाता था। उसके पढ़ाने का ढंग बहुत अनाड़ी था। मगर हाइ का दिल उसे बहुत आसानी से सीख लेता। थिन्ह अकसर खराब तरीके से भी बात करता मगर हाइ को उसकी हर बात प्यारी लगती। उसका बेतकल्लुफी भरा व्यवहार हाइ को भावुक बना देता। वह इतना लम्बा था कि रसोई घर का दरवाजा उसके लिए बहुत नीचा लगता। जबकि औेरों के लिए ठीक था। जब भी वह पैपून आदि भारी सामान अपनी पीठ पर लाद कर लाता तो उतारने के लिए पहले तो उसे घुटनों के बल पर झुकना पड़ता, तब वह रसोई में घुस पाता और अपने पीठ पर लदा पैपून किसी तरह से जमीन पर रख पाता। हाइ थिन्ह को बेतरह चाहती थी। लेकिन उसके पास अपने दिल की बात कह पाने का साहस नहीं था। उसनें अपने हाथों से थिन्ह के लिए एक अलमारी तैयार कर दी थी ताकि पीठ पर लदा सामान उतारने के लिए उसे घुटने के बल झुकने की तकलीफ से बचाया जा सके। लेकिन थिन्ह के मन में हाइ के लिये इसतरह का कोई भाव नहीं था। वह तो उसे अपनी छोटी बहन की तरह ही समझता था और वैसा ही व्यवहार करता था। यहां तक कि वह उसके बालों तक को सहला देता। उसकी हर चीज की प्रशंसा करता। उसे इस बात की तनिक परवाह न थी कि हाइ एक शादी-शुदा औरत है और उसके एक बच्चा भी है। वह जब भी काम से वापस आता तो हाइ के लिए कुछ न कुछ उपहार जरूर लाता। कभी किराक लकड़ी से बना ब्रेसलेट तो कभी अमरीकी जहाजों की स्टील से बनी कंघी !
एक बार उसने उपहार के रूप में हाइ को लकड़ी के दानों से बना एक माला दिया। यह इतना कीमती ओैर दुर्लभ था कि हाइ ने ऐसी माला अपने पूरे जीवन में पाने की कभी कल्पना भी नही की थी। ‘‘ अगर यह जंगली किराक लकड़ी से बना हुआ है तो यह इतना रंगीन कैसे हो सकता हैं?’’- हाइ नें थिन्ह से पूछा था। तब थिन्ह नें छोटे छोटे औैजारों से बना एक उपकरण,एक छोटा ड्रिल और पालिश दिखाया। उसने बताया था कि पीढ़ियों से ये चीजें अपने बाप दादा से विरासत मंे मिलती चली आ रही हैं। ठीक उसी तरह जैसे कि जारी जाति(दक्षिण वियतनाम का एक अल्पसंख्यक समुदाय) के लोग बंदूक और चाकू के बिना रह नहीं सकते, वैसे ही हमारे लिये ये उपकरण हंै।
चू मो(एक पहाड़) का अभियान खत्म हो चुकने के बाद एच-15 यूनिट वापस आ चुकी थी। मगर थिन्ह नहीं लौटा था। थिन्ह के बिना हाइ का किसी काम में मन नहीं लगता था। वह खाना बनाने का काम भूल कर यहां वहां गायब हो जाती। कामरेड उसे खोजा करते। वह थिन्ह की याद में खोई कभी कही तो कभी कहीं अन्यमनस्क सी बैठी मिलती। मन ही मन वह थिन्ह से कहती,‘‘अगर दूसरे कामरेडों के साथ तुम नहीं आ सकते थे तो मेरे लिए कम से कम एक चिटठी ही छोड़ दिये होते.... तुम तो हमेशा कुछ न कुछ उपहार दिया करते थे...’’ बाद में उसे पता चला था कि थिन्ह यूनिट के काम से रूका हुआ है। वह मरा नहीं है। जब वह लौट कर आया तो हाइ ने महसूस किया कि वह अब पहले वाला थिन्ह नहीं है। हाइ से वह बहुत कम मिलता। पहले की तरह उसे कोई उपहार भी वह अब नहीं देता था। हाइ उसके बदले हुए व्यवहार से बहुत दुखी और चुप-चुप रहने लगी थी। न उससे बात करती और न ही उसकी तरफ देखती । थिन्ह के साथ उसके सम्बन्धों को ले कर कामरेडों के मजाकों को भी वह अब अनसुना कर देती थी। अब जब थिन्ह सब्जी या कोई अैार सामान ले कर रसोई में आता तो वह किसी काम में व्यस्त होने का बहाना करने लगती। उसने अपने मन को समझाया, ‘‘अब हमे इसकी परवाह नहीं करनी है।’’ एक बार थिन्ह अपनी गीली कमीज सुखाने के लिए रसोई में आग के पास कुछ देर तक रूका रहा। हाइ ने इस काम में उसकी कोई मदद नहीं की। एक वक्त वह भी था जब वह खुद उसके कपड़े सुखाया करती थी। लेकिन इस बार ?.... नहीं....। अब वे दोनो बदल गये थे। तभी मोैका देख कर थिन्ह नें पूछा, ‘‘ क्या तुम मुझसे नाराज हो ?’’ हाइ ने कोई उत्तर नहीं दिया। हां, चूल्हे की जलती आग मे उसने कुछ और लकड़ियां जरूर डाल दी। ओैर उसके बाद आर्मी पाट में पानी भर कर उसमें सूअरों का खाना तैैयार करने के लिए मैनियाक के टुकडों को मिलाने लगी थी।
यूनिट में हर किसी को यह बात मालूम थी कि थिन्ह कुंवारा है। जबकि हाइ को-पा-हेंग की पत्नी है और उसके एक बच्चा भी है। बच्चा जब 3 वर्ष का हो गया तो हेंग नें हाइ को गुरिल्ला यूनिट में काम करने से मना कर दिया था। और उसे वापस घर भेज दिया था। लेकिन कुछ महीने बाद जब वह घर गया तो हाइ को लड़ाकू क्रांतिकारियों के कैम्प में ले कर आ गया, जहां वह जिला कमिटी के बेस-कैम्प मे रसोइये का काम करने लगी थी। वहां करीब छ महीना ही उसने काम किया होगा कि हेंग उसे लेकर सैनिक बटालियन की मुख्य टुकड़ी- एच-15 यूनिट- चला आया। इस यूनिट के सभी कामरेड क्योंमिक शिक्षित और अनुशासन प्रिय उत्तरी वियतनाम के निवासी थे ,इसलिए हेंग ने सोचा कि हाइ को इस यूनिट में ही रखना पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।
हाइ ने हेंग को पहली बार अपने गांव में देखा था। हेंग का दल मुक्ति अभियान में गुरिल्ला नौजवानों की भर्ती के लिए उसके गांव में आया था। तब हाइ हेंग के गंभीर व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थी। वह उसे मन ही मन चाहने लगी थी। हाइ को मालूम हुआ कि हेंग शादी-शुदा है और उसके दो बच्चे भी हैं। मगर जब उसने जाना कि अमरीकी सेना के अत्याचारी दबाव के नाते उसकी पत्नी को उसे छोड़ कर दुश्मन की सेना के किसी सिपाही के साथ चले जाना पड़ा है, तो वह हेंग को ओैर भी अधिक चाहने लगी थी। प्ली-डिट गांव के गुरिल्लाओं को यह जान कर बड़ी जलन होने लगी कि हाइ और हेंग एक दूसरे को चाहते हैं। पहले तो हाइ उसे अंकल कह कर बुलाती थी। लेकिन कुछ ही दिनों बाद भाई साहब कहने लगी। फिर बाद में तो दोनों इतना घुलमिल गये कि बिना किसी झिझक या शर्म के एक दूसरे से लिपट भी जाया करते थे। हाइ के माता-पिता को इसकी खबर नहीं थी। जिला कमिटी के सीनियर सिपाहियों ने जब सुना कि उनका लीडर अपने से काफी कम उम्र की एक गुरिल्ला लड़की से प्यार करता है तो उन्हंे भी यह अच्छा नहीं लगा। पार्टी सेल की बैठक में भी इसकी चर्चा गर्म रही। किसी ने हाइ से पूछा, ‘‘ क्या यह उचित है?’’ ‘‘ इसमें अनुचित जैसा तो कुछ भी नहीं है - हाइ ने कहा-अगर वह मुझे प्यार करता है तो इसमें बुराई क्या है?’’ इसके कुछ ही दिन बाद दोनों ने शादी कर ली थी। उनके एक बच्चा भी हुआ था। बच्चा पैदा होने के बाद हाइ दिन प्रति दिन सुंदर दिखने लगी थी। युद्ध के आतंक का उस पर कोई असर नहीं था। उसका रंग काफी निखरा हुआ और होठ रसीले दिखने लगे थे। उसके रूप का आकर्षण दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा था। उसकी आवाज में पहले की अपेक्षा दसगुना मिठास भर गई थी। पहले इक्का-दुक्का लोग ही उसकी तरफ ध्यान देते थे लेकिन अब तो हर कोई उसके रूप का दीवाना था। जंगल में खिले हुए हजार हजार फूलों में वह अब एक ऐसा खूबसूरत फूल थी जिस पर जाकर सभी की आंखे ठहर जाती थी। उसकी निखरी हुइ्र्र सुंदरता ने उसके पति हेेंग को चिंता में डाल दिया था। हेंग नें मन ही मन अपने आप से कहा, ‘‘एक ही रास्ता है-, या तो जिला सशस्त्र बल का नेतृत्व छोड़ कर पत्नी और बच्चों के साथ गांव चला जाऊं या फिर हाइ एच-15यूनिट की सदस्यता छोड़ कर बच्चे के साथ वापस गांव चली जाय।’’ तमाम ना नुकुर के बाद अंततः हाइ को ही यूनिट छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा। हाइ को गावं भेज कर, उसने उसके वहां आराम से रहने का सारा इंतजाम कर भी कर दिया। लेकिन, हाइ को गांव भेज देने के बाद भी हेंग निश्चिंत नहीं हो सका था। अब भी उसका मन काम में नहीं लगता था। उसकी उलझन को महसूस करते हुए जिला कमिटी नें उसे सलाह दी कि वह हाइ को यही लेता आये, उसे कुक के काम पर लगा दिया जाएगा। कमिटी के सदस्यों ने विचार बनाया कि पहले हाइ जिला कमिटी के लिए कुछ दिन कुक का काम करे। फिर उसे उच्च शिक्षा के लिए और फिर उसके बाद डाक्टरी पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया जाएगा। लेकिन, हाइ को जिला कमिटी में वापस ला कर भी हेंग निश्चिंत नहीं हो पाया था। क्योंकि यहां के कामरेड, किसी भी जिला समिति के कामरेडों से, अधिक सुंदर, आकर्षक, हंसमुख, सुसभ्य और स्वस्थ थे। उन्हें सशस्त्र यूनिट के कामरेडों की तरह युद्ध में भी नहीं जाना पड़ता था। इस तरह उनका जीवन काफी सुरक्षित और आसान भी था। ऐसी स्थिति में हेंग भला निश्चिंत कैसे रह सकता था? संयोग से उसी समय वहां एच-15 यूनिट भी तैनात की जा रही थी। हेंग नें इस यूनिट के लीडर हान से जब अपनी बात कही तो वह हाइ को अपनी यूनिट का न केवल कुक बल्कि मैनेजर भी बनाने के लिए तैयार हो गया। पहले तो हाइ वहां जाने के लिए तैयार न हुई। क्योंकि वह जानना चाहती थी कि ‘‘यहां से उसे क्यों वहां भेजा जा रहा है। जबकि यहां अभी उसनें अपना काम शुरू ही किया है।’’
-- हेंग ने कहा,‘‘तुम क्रांति के अभियान में शामिल हो, इसलिए तुम्हें आदेश का पालन करना होगा।’’
--‘‘लेकिन मेरे बेटे की देखभाल कोैन करेगा ?’’ हाइ ने चिंतित स्वर में अपने पति हेग से पूछा।
--‘‘ वह अपने नाना-नानी और मेरे पास रहेगा। मैं महीने-दो महीने में जा कर उसकी देख-भाल करता रहूंगा।’’ हेग नें कहा।
-- हाइ नें जोर दे कर कहा, ‘‘पहले वादा करो कि एच-15 यूनिट में जाने के बाद भी तुम मुझे अपने बेटे के पास जाने दोगे।’’ उसे छोड़ कर रहना मुझे बहुत खलेगा। मैं उसे बहुत मिस करूंगी।’’
-- ‘‘ हम लोग क्रांतिकारी अभियानों में लगे हुए लोग हैं। हमें ‘मिस करने’ जेैसे शब्दों से हर हाल में परहेज करना चाहिए। अब मुझे सब इंतजाम करने दो।’’, हेंग नें कहा।
-- ‘‘ हे ईश्वर ! तुम हमेशा यही दुहराते हो- ‘‘ हमे हर हाल में’...... ’’ हाइ ने मन मे कहा।
अपने प्यारे बेटे और जानी-समझी टुकड़ी को छोड़नें के निर्णय नें उसे दुखी कर दिया था। लेकिन वह कर भी क्या सकती थी। आदेश का पालन तो करना ही था। आखिर तो यह क्रांतिकारी अभियान के हित में लिया गया एक निर्णय था। उसे भला क्या पता था कि यह पार्टी का नहीं, हेंग का अपना निर्णय था। मगर हाइ के एच-15यूनिट में चले जाने के बाद भी हंेग की चिंता दूर नहीं हुई थी। हेंग के मन में यह आशंका घर कर गई थी कि कोई घात लगाए बैठा है और मोैका मिलते ही हाइ को ले कर उड़ जाएगा। इसलिए अब भी वह पूरी तरह से निश्चिंत नहीं था। अब वह सोचने लगता कि उत्तरी प्रांत के सैनिक स्मार्ट और पढ़े लिखे हैं। हो सकता कि मेरी वाईफ में उनकी रूचि न हो। लेकिन बहुत मुमकिन है कि वही किसी प्रेम कर बैठे। और यही हुआ भी। हाइ यहां आ कर पूरी तरह बदल गई थी। सेना की वर्दी में वह दिनों दिन स्वस्थ और सुंदर दिखने लगी। अब वह सलीकेदार मीठी भाषा में बातें करती। कैम्प मे रहते हुए वह कंघी, शीशा, तमाम तरह की वैसलीन और परफयूम रखने लगी थी। उसने कमरे की दीवालों पर सुंदर संुदर चित्र भी चिपका रखे थे। अब वह वियतनामी भाषा ‘किन्ह’ पहले से काफी अच्छा बोलना सीख गई थी। सब कुछ जानते हुए भी हेंग यह पूछ नहीं पाता था कि कौन है उसका टीचर। उसे क्या पता था, कि एक आशंका, जो हमेशा उसके मन में बनी रहती थी, वह अब सच होने जा रही थी।
हाइ की नजर में हेंग अब पहले जैसा स्मार्ट और दिव्य नहीं रह गया था। अब वह हमेशा बात बात पर लड़ाई झगड़ा करता रहता। एच-15यूनिट का कैम्प जहां लगा था, वह एक घना जंगल था। रात मे एकदम सन्नाटा छा जाता था । ऐसा सन्नाटा कि आप दूर बहते हुए झरने की आवाज सुन लें। यहां तक कि किसी सूखी टहनी के टूट कर गिरने की ‘खुट’सी आवाज या मच्छरदानी के बाहर मच्छरों की भिन भिन भी......। जब भी हेंग एच-15यूनिट के कैम्प में अपनी पत्नी हाइ से मिलने आता, तो उसके पास शराब की एक बोतल होती। बिना बोले, बिना बात किये,हाइ के सामने चुपचाप बैठ कर वह शराब पीता रहता। हाइ को भी आफर करने की बात वह सोचता तक नहीं। नशे में वह हाइ के साथ जैसे बलात्कार पर उतारू हो जाता। उसके कपड़ों को उतार फेंकता और उसके नंगे बदन को टार्च की रोशनी में निहारता। मगर, कामातुर हो कर नहीं। वह तो उसके बदन पर अनजान मर्दो के छोड़े हुए निशान ढूंढ़ता। पहले तो वह सोचती थी कि इसतरह वह उसके साथ हंसी-मजाक कर रहा है। इसलिए वह जोर जोर से हंसती और मजाक में कहती,‘‘अब ऐसा नया क्या है जिसे तुम देख रहे हो। सब तो वही है, पुराना-पहले जैसा।’’ मगर इतना कहने पर भी हेंग बोलता कुछ न था। एक दिन, जब वे दोनों काम-क्रिया में चरम पर पहुंचने पहुंचने को थे,तभी वह अचानक उठकर टेण्ट के बाहर भाग गया। वह एक अंधेरी रात थी। इतनी अंधेरी कि जैसे किसी नें स्याही उड़ेल दी हो। कुछ ही क्षण बाद वह फिर वैसे ही चुपचाप वापस आ गया और फिर उसे अपने आलिंगन मे कस लिया। मगर अबतक वह शांत और ठंढी हो चुकी थी। हाइ को संभेाग क्रिया मे ऐसी नीरसता का अनुभव इसके पहले नहीं हुआ था। वह अब बलात्कार करने पर उतारू हेा गया था। खिलौने की तरह हाइ को कभी नीचे पटक देता और कभी आसमान में उछाल देता। ऐसा एक बार नहीं,दो बार नहीं,यह आए दिन की बात हो गई थी।
यह सब करते-करते एक दिन जब कुछ न सूझा तब उसने कहा, ‘‘अब आज से मैं तुम्हारा पति नहीं हूं। समझी ?’’
‘‘नही-,हाइ उत्तर दिया-अब आज से मैं तुम्हारी बीवी नहीं हूं। अब मुझे अकेला छोड़ दो।’’
वह चीखा,‘‘मेरी बीवी नहीं हो? तो किसकी हो?’’
‘‘ किसी की नहीं’’ हाइ नें कहा।
हेंग नें के-59 राइफल उठा लिया।
‘‘ मुझे मार देना आसान हैै। लेकिन सोचो कि तुमसे पैदा हुए बच्चे की परवरिश कोैन करेगा- हाइ नें कहा, ‘‘अपने बच्चे की देखभाल के लिए अब मैं घर जाऊगीं।’’
अगली सुबह हेंग नें इस मसले पर यूनिट लीडर हान से विचार विमर्श किया तो हान नें उसे हाइ को यूनिट से ले जाने की इजाजत दे दी थी । इसके बाद हेंग उसे ले कर घर वापस चला आया। हेंग नें सोचा कि अब चिंता की कोई बात नहीं। हाइ अब एच-15 यूनिट के किसी कामरेड से मिल नहीं पाएगी। लेकिन हुआ ठीक इसके उल्टा। थिन्ह से अलग होने के बाद जेैसे जैसे दिन बीतते गये थे हाइ के दिल में उसके प्रति प्यार बढ़ता गया। थिन्ह को वह जितना ही याद करती, हेंग उतना ही ईष्र्या से भर जाता। जितना ही वह डाह करता, हाइ उतना ही शांत रहती। नतीजा यह हुआ कि दोनेां में आए दिन झगड़ा होने लगा। तंग आकर ग्रामप्रधान नें हेंग पर ग्राम देवता को सूअर की बलि चढ़ाने का जुर्माना ठोक दिया था।
अगले दिन, ग्रामदेवता को बलि चढ़ाने के बाद, हेंग अपने यूनिट के लिए रवाना हो गया। उसे ‘चू मो’ मोर्चे पर लड़ाई का प्लान तैयार करना था। इसबार उसकी टुकड़ी और एच-15 यूनिट को एक साथ मिलकर चीओ-रीओ (एक प्रांत) क्षेत्र को लिबरेट करने के लिए कूच करना था। थिन्ह के अग्रिम दस्ते को जिला सशस्त्र दस्ते की तैनाती के लिए उचित इलाके का पता करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तीन ग्रामीण साथियों औैर पुई बी को गुप्त गति विधियों के लिए लगा दिया गया था। संयोग से, हाइ से थिन्ह के अग्रिम दस्ते की भेंट हो गई। थिन्ह और हाइ दोनेंा एक दूसरे को पा कर चकित रह गये थे। गांव के गुरिल्ला जवानों की ओर से दी गई पार्टी में थेाड़ा पी लेने के कारण थिन्ह उस वक्त वह कुछ कुछ नशे में था।
यह जान कर कि थिन्ह नशे में है, कैम्प में लौटने पर,हाइ उसके लिए थोड़ा चिकेन सूप लेकर आई । उस समय दोनेां को ऐसा लगा था कि भगवान उनपर काफी मेहरवान है और भगवान की कृपा से ही दोनों की भेंट हो पाई हेै। बाकी दोनो कामरेड थिन्ह और हाइ के मुहब्बत से परिचित थे। इसलिए वे दोनेा कुछ ज्यादा ही देर तक गांव के जवानों के साथ पीने और खाने में समय गुजारते रहे। काफी दिनों के बाद दोनों मिले थे। इसलिए एकांत पाते ही दोनेां कस कर लिपट गये। दोनों एक दूसरे पर चुम्बनों की बैाछार करते रहे। वे इस कदर लिपट गये थे जैसे कि अब कोई भी ताकत उन्हे जुदा नहीं कर सकती। दोनो प्रेम में पागल हो रहे थे। हाइ, थिन्ह की बाहों में खुद को खो देने के लिए बेताब हो रही थी। और थिन्ह था कि रोमांच के अतिरेक से पत्ती की तरह कांप रहा था। उसे जाने क्या अचानक सूझा कि जल्दी जल्दी कपड़े पहन कर जंगल की तरफ भाग गया। हाइ से बिना एक भी शब्द कहे। चुपचाप। उसके बाद तो थिन्ह और उसका ग्रुप युद्ध के अभियान पर चला गया...।
हाइ के दोनों प्रेमियों में से अब कोई भी उसके पास नहीं रह गया था।
हाइ को छोड़ने के बाद हेंग नें जिला सशस्त्र बल की एक नर्स से रिश्ता बना लिया था,जिससे एक बच्ची थी। लेकिन कुछ ही दिन बाद वे दोनों चू मों पहाड़ पर दुश्मनों से लड़ते हुए मारे गये थे। उनकी मृत्यु का समाचार सुन कर हाइ यूनिट से उसकी बच्ची को अपने पास उठा लाई थी। अब उसके बेटे को एक बहन भी मिल गई थी। हाइ ने हेंग की बच्ची के नाम में अपना कुल-नाम भी जोड़ दिया। अब उसका नाम था- की-ओर हाइ-लिएन। धीरे धीेरे समय बीतता गया। अब तो उसका बेटा भी सशस्त्र सेना का लीडर बन गया है। और बेटी जिला अस्पताल में डाक्टर ।
ं हाइ की प्रेम कहानी जानने के बाद उसकी बेटी की-ओर-हाइ-लिएन नें थिन्ह की पहली पुण्य तिथि पर हाइ को उसके घर ले जाने के लिए अपने पति से कह कर ट्रेन का टिकट मंगवाया। थिन्ह के घर पहुंचने के बाद उन्हें पता चला कि युद्ध की विभीषिका के खत्म हो जाने के बाद भी, उसके दुष्परिणाम थिन्ह की बीवी का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। युद्ध में अमरीकी डाइआक्सिन जहर से थिन्ह तो मारा ही गया था, उसकी संतानों में भी उस जहर का प्रभाव चला आया है। उसके दोनों बच्चे जन्मजात विकृति से ग्रस्त हैं। थिन्ह की बीवी तो बांस की पतली छड़ी जैसी दुबली और कमजोर है। इतनी कमजोर कि उन अभागे बच्चों की देख भाल भी उसके लिए मुश्किल काम था। यह सब देख कर हाइ को रूलाई फूट पड़ी। उसने अपनी बेटी और दामाद से कहा, इनकी पीड़ा को बांटने के लिये अपनी रिटायरमेंट पेंशन और सैनिक बुक मैं इन्हें दे देना चाहती हूं -जंगल के उस आखिरी ढलान पर, जिसे तुम्हारे अंकिल थिन्ह प्यार का जंगल कहा करते थे ।
अनुवाद: कपिलदेव
लेबल:
वियतनामी कहानी
Monday, February 8, 2010
गोरख को याद करते हुए
गोरख पाण्डेय की मृत्यु के ठीक बीस वर्ष वाद, उनके परिजनों ने उनके पैतृक गांव पंडित का मुडेरा, जिला कुशीनगर में अपने ही घर प्रांगण में उन्हें समारोह पूर्वक याद किया। यह स्मृति समारोह, गोरख के नाम पर स्थापित गोरख पाण्डेय स्मृति न्यास देवरिया के सहयोग से आयोजित किया गया था। समारोह में ,गोरख स्मृति न्यास के सभी साथियों, ग्रामीणों तथा आसपास की जनता के अलावा इलाहाबाद से जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण, गोरखपुर से मनोज सिंह, अशोक चैधरी, देवेन्द्र आर्य,रामू,कपिलदेव आदि सहित तमाम लोग उपस्थित थे। गोरख पाण्डेय के बाल-मित्रों, गा्रम वासियों, परिजनों तथा क्रांतिचेता युवाओं सहित लगभग 50 लोगों नें उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियों को ताजा किया। गोरख के स्मृति-दिवस पर सबने उनका विशद मूल्यांकन किए जाने की आवश्यकता महसूस की। यहां गोरख को कुद पंक्तियों में याद करने की मैने विनम्र चेष्टा की है। जाहिर है, यह उनका मूल्यांकन नहीं हैं। लेकिन यदि इन विन्दुओं को आधार बनाया जाय तो उनके सम्यक मूल्यांकन की एक रूप रेखा तो खींची ही जा सकती है-- कपिलदेव
मोटे तौर पर सब यही जानते हैं कि गोरख की प्रतिबद्धता माक्र्सवाद के प्रति थी। पार्टी के प्रति थी या जनता को शोषण से मुक्त करने का रास्ता दिखाने वाले सिद्धान्तों के प्रति थी। लेकिन मै कहना चाहूंगा कि सबसे पहले उनकी प्रतिबद्धता खुद अपनी संवेदना के प्रति थी। उनकी संवेदना का विस्तार इतना व्यापक और गहराई इतनी अगाध थी कि वे उसके साथ चतुर संासारिक किस्म का व्यवहार स्वयं भी नहीं कर सकते थे। दूसरे शब्दों में, उनकी संवेदना ही उनके समूचे व्यक्तित्व की नियामक थी। अपनी संवेदना का नियमन-संचालन वे नहीं, बल्कि इसके उलट उनकी संवेदना ही उनका नियमन-संचालन करती थी। कदाचित यही कारण है कि विचारधारा,संगठन या रचनाकार- जिस भी रूप में हम उनकेा जानते हैं, उनका वह रूप अगर अन्य विचारकों, संगठन कर्ताओं या रचनाकारों से अलग दिखता है तो इसीलिए कि वे पूरी तरह अपनी आंतरिक संवेदनशीलता से परिचालित व्यक्ति थे। अन्यों की तरह वे क्रांतिकारी विचारों के स्थूल प्रचारक या प्रतिबद्धता के नाम पर किसी पाटीर्, दल या विचारधारा द्वारा बताए नियमों का पालन करने वाले ऐसे आतुर क्रांतिकारी न थे जो सिर्फ अपनी निजी छाप या पहचान के लिए किसी संगठन के विचारों का बाहन बन कर रहना स्वीकार कर लेते हैं। इसके विपरीत गोरख एक ऐसे राजनीतिकर्मी,संस्कृतिकर्मी या विचारक थे जो अपनी आंतरिक संवेदनशीलता,, गहरी करूणा और स्वप्नशीलता के कारण इस धारा में स्वाभाविक तौर पर आते हैं। गोरख अगर मार्कसवाद के अनुयायी थे तो इसलिए कि माक्र्सवाद की बुनियादी विचारधारा उनकी संवेदना में पहले से मौजूद थी। यही कारण है कि वे माक्र्सवादी विचारों का बात बात में उल्लेख कर अपनी प्रतिबद्धता का प्रमाण देते रहने वाले बुद्धिजीवी न थे। माक्र्सवाद उनकी संवेदनशीलता मे नये तरह से प्रसार पाता था। जनता की मुक्ति उनके जीवन का केन्द्रीय स्वप्न था। इसलिए नहीं कि यह उनकी पार्टी का एजेण्डा था। बल्कि इसलिए कि यही उनकी संवेदना का एजेण्डा भी था। जनता के दुखेंा के प्रति स्वभावतः ही वे करूणा से ओतप््रोात रहते थे। इसलिए वे जहां और जिस काम में लगे हुए थे, वही और एक मात्र वही उनका रास्ता था। यह करूणा ही उन्हें सामाजिक राजनीतिक या संास्कृतिक बदलाव की गहन वैचारिकता में प्रवेश की प्रेरणा देती थी। उन्होंने माक्र्सवाद को सिर्फ पढ़ा ही नहीं, हृदयस्थ किया था। यों ही नहीं है कि वे अपने विचारों में, भाषणों में और लेखोें में किसी एकेडमिक सिद्धान्तकार या पेशेवर राजनीतिक या अमूर्त आदर्शवादी साहित्यकार की तरह अपने को अभिव्यक्त नहीं करते थे। उनकी अभिव्यक्ति की दिशा मूलगामी थी और उनकी सारी वैचारिक गतियों में जनता के प्रति गहरी संवेदना को महसूस किया जा सकता था।
गेारख निजी सम्पत्ति और व्यक्तिगत सत्ता का विरोध करने वाले सच्चे विचारक थे। यदि हमारे कथन को बहुत दूर तक न घसीटा जाय और सही संदर्भ में समझा जाय तो मैं कहना चाहूंगा कि गोरख कुछ मायनों में गांधी के क्रातिकारी अवतार थे। वे अगर निजी सम्पत्ति वाले समाज के विरूद्ध थे तो यह उनके आचरण और जीवन में भी दिखता था। और जाहिरा तौर पर, यह दिखावा नहीं था। जितना न्यूनतम में गोरख रहते थे, उतने न्यूनतम में रहने का साहस उनके समानधर्मा क्रांतिकारी नहीं कर सकते थे। उनकी संवेदना की उठान इतनी ऊंची, प्राकृतिक और स्वाभाविक थी कि उसे लेकर उनके समानधर्मा मित्र प्रायः चिंतित हो जाया करते थे। गोरख नें अपनी संवेदना और सांसारिकता में तालमेल बिठाने की शायद ही कभी कोशिश की। वे अगर किसी चीज का सबसे अधिक आदर करते थे, तो वह उनकी अपनी ही संवेदना थी।
गेारख जिस काल में जन्मे थे, वह निजी सम्पत्ति की लालच में डूब जाने का उत्कर्ष काल था। जो कामरेड या कवि कलाकार इस बे-शर्म लालच में डूबने उतराने से परहेज करते थे उनमें भी, छिपे तौर पर ही सही, निजता का लोभ इतना प्रबल था कि वे इस या उस रास्ते से उसेे संतुष्ट करने का रास्ता निकाल ही लेते थे। लेकिन गोरख सामाजिक प्राथमिकताओं के बीच कभी भी खास अपने लिए थेाड़ी सी भी जगह बना लेने की फिक्र करते हुए नहीं दिखे। अगर कहीं उनके मन के किसी कोने में यह इच्छा जगी भी होगी तो उनकी सामाजिकता की संवेदना इतनी प्रबल और का्रंति का स्वप्न इतना असंदिग्ध था कि उसके सामने ऐसी तुच्छताएं गोरख के भीतर अधिक देर तक टिक भी नहीं सकती थीं। गोरख चाहते तो तमाम दूसरे क्रांति-सेवी विद्वानों की तरह,क्रांतिकारी कार्यकर्ता का दायित्व निभाते हुए, एक बड़ा कवि, आलोचक, निबंधकार या कथाकार बन सकते थे। साहित्य और विचार की दुनिया में वे जिस भी मुकाम को पाना चाहते हासिल कर सकते थे। उन्होंने कहानियां भी लिखीं, और कविताएं भी। विचारपरक आलेख के मामले में उनकी प्रतिभा निर्विवाद थी। अपने समय की पत्रिकाओं द्वारा चलाई बहसों में उनकी सतर्क हिस्सेदारी को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि चाहते तो वे समर्थ आलोचक भी बन सकते थे। लेकिन यह सब करना उनके अभियान का हिस्सा था। निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति या जीवनोपरांत अपने नाम से कुछ बौद्धिक सम्पदा छोड़ जाना उनके जीवन का लक्ष्य न था। वे उनमें से नहीं थे, जो दिमाग में आये हुए हर विचार, वाक्य,शब्द और यहां तक कि अक्षर तक को रचना रूप में ढाल कर अपनी स्थाई निधि बना लेने के लिए परेशान रहते हैं। जिन्हें हर साल अपनी अस्मिता को प्रमाणित करने के लिए किसी न किसी किताब या करतब के साथ देश और समाज के मंच पर हाजिर होना जरूरी लगता है। बहती हुई धारा में अपनी जगह बनाने को व्यग्र उपलब्धि-प्रेमी ऐसे रचनाकारों- लेखकों की जमात से अलग रहते हुए, गोरख संस्कृति और विचार की ऐसी दुनिया गढ़ना चाहते थे जिसमें शोषण के विरूद्ध संधर्ष की चेतना से सम्पन्न पीढ़ियां तैयार होती रहें। किसी किताबी रचना से अधिक वे उस मनुष्य की रचना करना चाहते थे जो एक नये समाज और नये संसार की रचना के प्रति संकल्प बद्ध होगा।
गोरख ने कम लिखा है। जो लिखा ह,ै कठिन संधर्षाो के बीच लिखा है। अपने हिरावल दस्तों के सपनों को स्पष्ट और सक्रिय करने के लिए लिखा है। यद्यपि उन्होंने कागज पर लिखने से अधिक युवा मनों में सपनों की इबारत लिखना अपने जीवन का ध्येय बनाया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें संघर्ष के व्यापक अभियान में साहित्य लेखन का मोल मालूम नहीं था। वे स्वयं भारतीय और पश्चिमी साहित्य और चिंतन परम्परा के गहरे जानकार थे। वे सामाजिक बदलाव के मुहिम में अपने समकालीन साहित्यकारों की अहमियत को भी जानते थे। साहित्य-कर्म उनकी निगाह में आंदोलन का ही एक अनिवार्य अंग था। इसलिए वे व्यक्तियों के स्तर पर घटित हो रहे साहित्यिक-रचनात्मक प्रयत्नों को एक निश्चित लक्ष्य से जोड़ देने के लिए सामूहिक विवेक की रचना करने की जरूरत भी महसूस करते थे। वे जानते थे कि किसी ऐतिहासिक लक्ष्य का संधान अकेले का काम नहीं है। अतः उन्हेांनें जसम के रूप में जिस वैचारिक-सांस्कृतिक संगठन की रचना करने की पहल की,। उनकी निर्वैयक्तिक रचनाशीलता की यह ऐसी विरल कृति है जिसकी प्रेरणा से मुक्तिकामी विचारों की अजस्त्र परम्परा हमेशा ही आगे बढ़ती रहेगी।
जसम यदि किसी भी रूप में अपने होने को गोरख के सपनों से जोड़ कर देखना चाहता है तो उसे उनकी संवेदना के गहरे आशयों को अपना पाथेय बनाना होगा।
कपिलदेव
मोटे तौर पर सब यही जानते हैं कि गोरख की प्रतिबद्धता माक्र्सवाद के प्रति थी। पार्टी के प्रति थी या जनता को शोषण से मुक्त करने का रास्ता दिखाने वाले सिद्धान्तों के प्रति थी। लेकिन मै कहना चाहूंगा कि सबसे पहले उनकी प्रतिबद्धता खुद अपनी संवेदना के प्रति थी। उनकी संवेदना का विस्तार इतना व्यापक और गहराई इतनी अगाध थी कि वे उसके साथ चतुर संासारिक किस्म का व्यवहार स्वयं भी नहीं कर सकते थे। दूसरे शब्दों में, उनकी संवेदना ही उनके समूचे व्यक्तित्व की नियामक थी। अपनी संवेदना का नियमन-संचालन वे नहीं, बल्कि इसके उलट उनकी संवेदना ही उनका नियमन-संचालन करती थी। कदाचित यही कारण है कि विचारधारा,संगठन या रचनाकार- जिस भी रूप में हम उनकेा जानते हैं, उनका वह रूप अगर अन्य विचारकों, संगठन कर्ताओं या रचनाकारों से अलग दिखता है तो इसीलिए कि वे पूरी तरह अपनी आंतरिक संवेदनशीलता से परिचालित व्यक्ति थे। अन्यों की तरह वे क्रांतिकारी विचारों के स्थूल प्रचारक या प्रतिबद्धता के नाम पर किसी पाटीर्, दल या विचारधारा द्वारा बताए नियमों का पालन करने वाले ऐसे आतुर क्रांतिकारी न थे जो सिर्फ अपनी निजी छाप या पहचान के लिए किसी संगठन के विचारों का बाहन बन कर रहना स्वीकार कर लेते हैं। इसके विपरीत गोरख एक ऐसे राजनीतिकर्मी,संस्कृतिकर्मी या विचारक थे जो अपनी आंतरिक संवेदनशीलता,, गहरी करूणा और स्वप्नशीलता के कारण इस धारा में स्वाभाविक तौर पर आते हैं। गोरख अगर मार्कसवाद के अनुयायी थे तो इसलिए कि माक्र्सवाद की बुनियादी विचारधारा उनकी संवेदना में पहले से मौजूद थी। यही कारण है कि वे माक्र्सवादी विचारों का बात बात में उल्लेख कर अपनी प्रतिबद्धता का प्रमाण देते रहने वाले बुद्धिजीवी न थे। माक्र्सवाद उनकी संवेदनशीलता मे नये तरह से प्रसार पाता था। जनता की मुक्ति उनके जीवन का केन्द्रीय स्वप्न था। इसलिए नहीं कि यह उनकी पार्टी का एजेण्डा था। बल्कि इसलिए कि यही उनकी संवेदना का एजेण्डा भी था। जनता के दुखेंा के प्रति स्वभावतः ही वे करूणा से ओतप््रोात रहते थे। इसलिए वे जहां और जिस काम में लगे हुए थे, वही और एक मात्र वही उनका रास्ता था। यह करूणा ही उन्हें सामाजिक राजनीतिक या संास्कृतिक बदलाव की गहन वैचारिकता में प्रवेश की प्रेरणा देती थी। उन्होंने माक्र्सवाद को सिर्फ पढ़ा ही नहीं, हृदयस्थ किया था। यों ही नहीं है कि वे अपने विचारों में, भाषणों में और लेखोें में किसी एकेडमिक सिद्धान्तकार या पेशेवर राजनीतिक या अमूर्त आदर्शवादी साहित्यकार की तरह अपने को अभिव्यक्त नहीं करते थे। उनकी अभिव्यक्ति की दिशा मूलगामी थी और उनकी सारी वैचारिक गतियों में जनता के प्रति गहरी संवेदना को महसूस किया जा सकता था।
गेारख निजी सम्पत्ति और व्यक्तिगत सत्ता का विरोध करने वाले सच्चे विचारक थे। यदि हमारे कथन को बहुत दूर तक न घसीटा जाय और सही संदर्भ में समझा जाय तो मैं कहना चाहूंगा कि गोरख कुछ मायनों में गांधी के क्रातिकारी अवतार थे। वे अगर निजी सम्पत्ति वाले समाज के विरूद्ध थे तो यह उनके आचरण और जीवन में भी दिखता था। और जाहिरा तौर पर, यह दिखावा नहीं था। जितना न्यूनतम में गोरख रहते थे, उतने न्यूनतम में रहने का साहस उनके समानधर्मा क्रांतिकारी नहीं कर सकते थे। उनकी संवेदना की उठान इतनी ऊंची, प्राकृतिक और स्वाभाविक थी कि उसे लेकर उनके समानधर्मा मित्र प्रायः चिंतित हो जाया करते थे। गोरख नें अपनी संवेदना और सांसारिकता में तालमेल बिठाने की शायद ही कभी कोशिश की। वे अगर किसी चीज का सबसे अधिक आदर करते थे, तो वह उनकी अपनी ही संवेदना थी।
गेारख जिस काल में जन्मे थे, वह निजी सम्पत्ति की लालच में डूब जाने का उत्कर्ष काल था। जो कामरेड या कवि कलाकार इस बे-शर्म लालच में डूबने उतराने से परहेज करते थे उनमें भी, छिपे तौर पर ही सही, निजता का लोभ इतना प्रबल था कि वे इस या उस रास्ते से उसेे संतुष्ट करने का रास्ता निकाल ही लेते थे। लेकिन गोरख सामाजिक प्राथमिकताओं के बीच कभी भी खास अपने लिए थेाड़ी सी भी जगह बना लेने की फिक्र करते हुए नहीं दिखे। अगर कहीं उनके मन के किसी कोने में यह इच्छा जगी भी होगी तो उनकी सामाजिकता की संवेदना इतनी प्रबल और का्रंति का स्वप्न इतना असंदिग्ध था कि उसके सामने ऐसी तुच्छताएं गोरख के भीतर अधिक देर तक टिक भी नहीं सकती थीं। गोरख चाहते तो तमाम दूसरे क्रांति-सेवी विद्वानों की तरह,क्रांतिकारी कार्यकर्ता का दायित्व निभाते हुए, एक बड़ा कवि, आलोचक, निबंधकार या कथाकार बन सकते थे। साहित्य और विचार की दुनिया में वे जिस भी मुकाम को पाना चाहते हासिल कर सकते थे। उन्होंने कहानियां भी लिखीं, और कविताएं भी। विचारपरक आलेख के मामले में उनकी प्रतिभा निर्विवाद थी। अपने समय की पत्रिकाओं द्वारा चलाई बहसों में उनकी सतर्क हिस्सेदारी को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि चाहते तो वे समर्थ आलोचक भी बन सकते थे। लेकिन यह सब करना उनके अभियान का हिस्सा था। निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति या जीवनोपरांत अपने नाम से कुछ बौद्धिक सम्पदा छोड़ जाना उनके जीवन का लक्ष्य न था। वे उनमें से नहीं थे, जो दिमाग में आये हुए हर विचार, वाक्य,शब्द और यहां तक कि अक्षर तक को रचना रूप में ढाल कर अपनी स्थाई निधि बना लेने के लिए परेशान रहते हैं। जिन्हें हर साल अपनी अस्मिता को प्रमाणित करने के लिए किसी न किसी किताब या करतब के साथ देश और समाज के मंच पर हाजिर होना जरूरी लगता है। बहती हुई धारा में अपनी जगह बनाने को व्यग्र उपलब्धि-प्रेमी ऐसे रचनाकारों- लेखकों की जमात से अलग रहते हुए, गोरख संस्कृति और विचार की ऐसी दुनिया गढ़ना चाहते थे जिसमें शोषण के विरूद्ध संधर्ष की चेतना से सम्पन्न पीढ़ियां तैयार होती रहें। किसी किताबी रचना से अधिक वे उस मनुष्य की रचना करना चाहते थे जो एक नये समाज और नये संसार की रचना के प्रति संकल्प बद्ध होगा।
गोरख ने कम लिखा है। जो लिखा ह,ै कठिन संधर्षाो के बीच लिखा है। अपने हिरावल दस्तों के सपनों को स्पष्ट और सक्रिय करने के लिए लिखा है। यद्यपि उन्होंने कागज पर लिखने से अधिक युवा मनों में सपनों की इबारत लिखना अपने जीवन का ध्येय बनाया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें संघर्ष के व्यापक अभियान में साहित्य लेखन का मोल मालूम नहीं था। वे स्वयं भारतीय और पश्चिमी साहित्य और चिंतन परम्परा के गहरे जानकार थे। वे सामाजिक बदलाव के मुहिम में अपने समकालीन साहित्यकारों की अहमियत को भी जानते थे। साहित्य-कर्म उनकी निगाह में आंदोलन का ही एक अनिवार्य अंग था। इसलिए वे व्यक्तियों के स्तर पर घटित हो रहे साहित्यिक-रचनात्मक प्रयत्नों को एक निश्चित लक्ष्य से जोड़ देने के लिए सामूहिक विवेक की रचना करने की जरूरत भी महसूस करते थे। वे जानते थे कि किसी ऐतिहासिक लक्ष्य का संधान अकेले का काम नहीं है। अतः उन्हेांनें जसम के रूप में जिस वैचारिक-सांस्कृतिक संगठन की रचना करने की पहल की,। उनकी निर्वैयक्तिक रचनाशीलता की यह ऐसी विरल कृति है जिसकी प्रेरणा से मुक्तिकामी विचारों की अजस्त्र परम्परा हमेशा ही आगे बढ़ती रहेगी।
जसम यदि किसी भी रूप में अपने होने को गोरख के सपनों से जोड़ कर देखना चाहता है तो उसे उनकी संवेदना के गहरे आशयों को अपना पाथेय बनाना होगा।
कपिलदेव
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Gorakh pandey
Wednesday, May 6, 2009
यानी मैं
सिंदबाद के समुद्री डाकुओं
और मुनाफाखोर मनुष्यताओं के रक्तपाती इतिहास के
सदियों पुराने
जर्जर पृष्ठों से छिटक कर
इक्कीसवीं सदी की बिलासी वैचारिकता में
नख-दंत की तरह धंसा हुआ
मैं एक अनवरत इनकार हूं-
सृष्टि का आदि अव्यय
जिसे
नष्ट करने के अभियानों का इतिहास ही
सभ्यताओं का इतिहास है
मैं एक औजार हूं
पिछली सदी के बंद पड़े
कारखानेा के
दरवाजों से झांकता हुआ
तोरण-द्वार की तरह सजने वाली कविता के खिलाफ
उबलता हुआ एक प्रतिवाद हूं मैं
जो
समझौता परस्त
चालाक और दुनियादार हाथों का रूमाल बनने से
इनकार करता है।
मैं अपने समय की सुचिक्कणता पर थूकता हूं
अपने प्यारे प्यारे चूजों की चोंच में
दाना डालते ‘थिंक-टैंकों’ की आंखो का कांइयापन
मेरे रक्तचाप को बढ़ा देता है
मैं अपने ही ‘पन’ के साथ जीना चाहता हूं।
मुझे जन्म देने वाली सदी को लेकर बहस छेड़ दी गई है
अफवाह है कि मैं
मनुष्यता की कोख में अनादि काल से छिपा
एक अदृश्य विकार हूं
मैं इतिहास का अपवाद हूं
जिसे
अवांछित घोषित करने के लिए
संविधान में संशोधन की घोषणा की जा चुकी है
गुस्सा और असहमति और प्रश्नाकुलता और असंतोष का
उबलता हुआ ज्वार हूं मैं
एक अचरज
एक कलछौंह-
शीत-ताप नियंत्रित इक्कीसवीं सदी के समृद्ध गालों पर।
मेरे बध का दिन मुकर्रर किया जा रहा है
प्रचारित कर दिया गया है कि
मेरी खदबदाहट
आधुनिकता की डेªनेज से गिरता हुआ बदबूदार झाग है
बुद्धिजीवियों के बीच मैं एक तकलीफ देह एजेंडा हूं
एक असुविधा
अर्थात्
संस्कृति के जननायकों की पीठ पर
मची खुजली
मैं
पुरखों के अधबने सपनों को
बहुराष्ट्रीय राजमार्गों पर
फेक कर भागती हुई
भविष्य-भीत पीढ़ी के अपराधों का
चश्मदीद गवाह हूं
साक्षी हूं मैं
उगती हुई इस सदी का
जिसका वृहस्पति
हत्यारों द्वारा आयोजित रात्रि-भोज में
सुविधाओं की चैपड़ पर हमारी निष्ठाओं का
दांव लगा रहा है
और लाल सलाम की गद्दी पर बैठा हुआ
बिना चेहरे वाला कामरेड
इक्कीसवीं सदी के नराधमों की रहनुमाई में
हंसने और
खामोश रहने का प्राणायाम सीख रहा है
मैं एक कटघरा हूं, जिसमें खड़ी हो कर
यह सदी
अपनी सफाई में
झूठ की प्रौद्योगिकी का हलफनामा दायर कर रही है
पता किया जा रहा है
मेरे बारे में
पूछा जा रहा है दिगन्तों से कि
मेरा गुस्सा
ग्लात्सनोत्स के किस अध्याय के किस पृष्ठ पर रह गई
प्रूफ की अशुद्धि का खामियाजा है
जेड श्रेणी की सुरक्षा में सपनों का साइरन बजाती
हहराती हुई इस इक्कीसवीं सदी के
रम हल्लेमे कब
और
कहां से आ गया यह दनदनाता हुआ इनकार
यानी मैं .............................. 5.5.09
और मुनाफाखोर मनुष्यताओं के रक्तपाती इतिहास के
सदियों पुराने
जर्जर पृष्ठों से छिटक कर
इक्कीसवीं सदी की बिलासी वैचारिकता में
नख-दंत की तरह धंसा हुआ
मैं एक अनवरत इनकार हूं-
सृष्टि का आदि अव्यय
जिसे
नष्ट करने के अभियानों का इतिहास ही
सभ्यताओं का इतिहास है
मैं एक औजार हूं
पिछली सदी के बंद पड़े
कारखानेा के
दरवाजों से झांकता हुआ
तोरण-द्वार की तरह सजने वाली कविता के खिलाफ
उबलता हुआ एक प्रतिवाद हूं मैं
जो
समझौता परस्त
चालाक और दुनियादार हाथों का रूमाल बनने से
इनकार करता है।
मैं अपने समय की सुचिक्कणता पर थूकता हूं
अपने प्यारे प्यारे चूजों की चोंच में
दाना डालते ‘थिंक-टैंकों’ की आंखो का कांइयापन
मेरे रक्तचाप को बढ़ा देता है
मैं अपने ही ‘पन’ के साथ जीना चाहता हूं।
मुझे जन्म देने वाली सदी को लेकर बहस छेड़ दी गई है
अफवाह है कि मैं
मनुष्यता की कोख में अनादि काल से छिपा
एक अदृश्य विकार हूं
मैं इतिहास का अपवाद हूं
जिसे
अवांछित घोषित करने के लिए
संविधान में संशोधन की घोषणा की जा चुकी है
गुस्सा और असहमति और प्रश्नाकुलता और असंतोष का
उबलता हुआ ज्वार हूं मैं
एक अचरज
एक कलछौंह-
शीत-ताप नियंत्रित इक्कीसवीं सदी के समृद्ध गालों पर।
मेरे बध का दिन मुकर्रर किया जा रहा है
प्रचारित कर दिया गया है कि
मेरी खदबदाहट
आधुनिकता की डेªनेज से गिरता हुआ बदबूदार झाग है
बुद्धिजीवियों के बीच मैं एक तकलीफ देह एजेंडा हूं
एक असुविधा
अर्थात्
संस्कृति के जननायकों की पीठ पर
मची खुजली
मैं
पुरखों के अधबने सपनों को
बहुराष्ट्रीय राजमार्गों पर
फेक कर भागती हुई
भविष्य-भीत पीढ़ी के अपराधों का
चश्मदीद गवाह हूं
साक्षी हूं मैं
उगती हुई इस सदी का
जिसका वृहस्पति
हत्यारों द्वारा आयोजित रात्रि-भोज में
सुविधाओं की चैपड़ पर हमारी निष्ठाओं का
दांव लगा रहा है
और लाल सलाम की गद्दी पर बैठा हुआ
बिना चेहरे वाला कामरेड
इक्कीसवीं सदी के नराधमों की रहनुमाई में
हंसने और
खामोश रहने का प्राणायाम सीख रहा है
मैं एक कटघरा हूं, जिसमें खड़ी हो कर
यह सदी
अपनी सफाई में
झूठ की प्रौद्योगिकी का हलफनामा दायर कर रही है
पता किया जा रहा है
मेरे बारे में
पूछा जा रहा है दिगन्तों से कि
मेरा गुस्सा
ग्लात्सनोत्स के किस अध्याय के किस पृष्ठ पर रह गई
प्रूफ की अशुद्धि का खामियाजा है
जेड श्रेणी की सुरक्षा में सपनों का साइरन बजाती
हहराती हुई इस इक्कीसवीं सदी के
रम हल्लेमे कब
और
कहां से आ गया यह दनदनाता हुआ इनकार
यानी मैं .............................. 5.5.09
लेबल:
kavta
Friday, April 10, 2009
एक कर्मचारी का विदाई समारोह
चमक रहा है उसकी आंखों का
खालीपन
सेवाकाल के अंत पर आयोजित उत्सव में
बुलाया गया है
संगमरमरी सीढ़ियों
कालीनों बिछे गलियारों से
लकदक सुसज्जित सभ्य-सभागार में
लाया गया है
चकित चैधियायी आंखों से अपनी ही
देख रहा है वह
बधस्थल पर लाए गए बकरे-सा
होता हुआ अपना ही अभिनन्दन
अपने ही जीवन में
पहली और अंतिम बार
इस प्रकार!
दौड़ती हुई हाफती सी जिंदगी की दौड़ से
बाहर कर दिया गया है उसे आज ही दिसम्बर की इस
इकतीसवीं तारीख को
‘आफटरनून से’
कर दिया गया है रिटायर
सेवा काल का यह अंतिम प्रहर
प्रारम्भ है नए दुःस्वप्न का
खोल दी गई है लगाम
निकाल लिए गए हैं खुरों में ठुके नाल
और हांक दिया गया है चटियल रेगिस्तान में
आजाद कर दिया गया है
देस की बघ्घी में नधा यह घोड़ा
जीवन के उत्तर-काल में
निहत्था बना कर छोड़ दिया गया है
जबकि युद्ध अभी अधूरा है
और उसके पखुरे ढीले पड़ गए हैं
ढीली पड़ गई है धमनियां
दुह उठी हैं
गुजिस्ता पैंतीस वर्षो तक वफादारी
ईमानदारी की तवारीख लिखते लिखते
जर्जर हो उठे हैं
उसकी जिन्दगी के पन्ने
बिला गया उसका जीवन
‘सर्विस पुस्तिका’ और गोपनीय रिपोटों
का बेदाग स्वाभिमान ढोते ढोते!
विदाई के दुख से
प्रशन्न होने का
अपनी ही रची दुनिया से बेगाना
कर दिए जाने का
कैसा
कातर क्षण है
यह अपने ही जीवन को
अमिट इतिहास में बदलता हुआ
देखने का ?
बखान के चैतरफा शोर से आक्रांत उसे
जिस समादृत आसन पर
बैठाया गया है--सर्वोच्च ईश्वर के प्रभावलय के
ठीक स्पर्श-विन्दु पर
सिंह के अयाल के इतने करीब होने के सुख और डर के बीच
आत्म-चकित है वह
अनघटा अटपटा अनुभव यह रोमांचक कितना
कातर बना रहा है उसे
कितना कृतज्ञ !
पैंतीस वर्षों का चिर प्रतीक्षित
पुरस्कार यह मौखिक
महोच्चार !
फहराई जा रही है
उसकी कीर्ति की पताका
खोखले शब्दों के फूल झर रहे हैं सभाकक्ष में
भरा जा रहा है भावनाओं का अकिंचन कटोरा
सद्वचनों के चिल्लर सिक्कों से
उसके जीवन में पहली और
अंतिम बार
मैं देख रहा था कि
उसके भीतर की उदासी की
धूसर रेत को भिगोती
बेगानी प्रशंसाओे की बौछारों नें
उसे असुविधा में डाल दिया है
रोना चाहता है जार जार
इस बहिष्कार-समारोह में
अपने अगोरते उदास बच्चों का आंसू
जबकि उसके पास रूमाल भी नहीं है
भीगते शब्दों से सराबोर
फूलों-मालाओं लदे इस समारोह से
उसने अलग कर लिया है अपनी आत्मा को
हो गया है अनात्म
मारण उच्चाटन मंत्रों से भरे हुए
अभिनन्दन-भाषणों से
डरी उसकी आत्मा
उठ कर
अपने बाल बच्चों में चली गई है
खालीपन
सेवाकाल के अंत पर आयोजित उत्सव में
बुलाया गया है
संगमरमरी सीढ़ियों
कालीनों बिछे गलियारों से
लकदक सुसज्जित सभ्य-सभागार में
लाया गया है
चकित चैधियायी आंखों से अपनी ही
देख रहा है वह
बधस्थल पर लाए गए बकरे-सा
होता हुआ अपना ही अभिनन्दन
अपने ही जीवन में
पहली और अंतिम बार
इस प्रकार!
दौड़ती हुई हाफती सी जिंदगी की दौड़ से
बाहर कर दिया गया है उसे आज ही दिसम्बर की इस
इकतीसवीं तारीख को
‘आफटरनून से’
कर दिया गया है रिटायर
सेवा काल का यह अंतिम प्रहर
प्रारम्भ है नए दुःस्वप्न का
खोल दी गई है लगाम
निकाल लिए गए हैं खुरों में ठुके नाल
और हांक दिया गया है चटियल रेगिस्तान में
आजाद कर दिया गया है
देस की बघ्घी में नधा यह घोड़ा
जीवन के उत्तर-काल में
निहत्था बना कर छोड़ दिया गया है
जबकि युद्ध अभी अधूरा है
और उसके पखुरे ढीले पड़ गए हैं
ढीली पड़ गई है धमनियां
दुह उठी हैं
गुजिस्ता पैंतीस वर्षो तक वफादारी
ईमानदारी की तवारीख लिखते लिखते
जर्जर हो उठे हैं
उसकी जिन्दगी के पन्ने
बिला गया उसका जीवन
‘सर्विस पुस्तिका’ और गोपनीय रिपोटों
का बेदाग स्वाभिमान ढोते ढोते!
विदाई के दुख से
प्रशन्न होने का
अपनी ही रची दुनिया से बेगाना
कर दिए जाने का
कैसा
कातर क्षण है
यह अपने ही जीवन को
अमिट इतिहास में बदलता हुआ
देखने का ?
बखान के चैतरफा शोर से आक्रांत उसे
जिस समादृत आसन पर
बैठाया गया है--सर्वोच्च ईश्वर के प्रभावलय के
ठीक स्पर्श-विन्दु पर
सिंह के अयाल के इतने करीब होने के सुख और डर के बीच
आत्म-चकित है वह
अनघटा अटपटा अनुभव यह रोमांचक कितना
कातर बना रहा है उसे
कितना कृतज्ञ !
पैंतीस वर्षों का चिर प्रतीक्षित
पुरस्कार यह मौखिक
महोच्चार !
फहराई जा रही है
उसकी कीर्ति की पताका
खोखले शब्दों के फूल झर रहे हैं सभाकक्ष में
भरा जा रहा है भावनाओं का अकिंचन कटोरा
सद्वचनों के चिल्लर सिक्कों से
उसके जीवन में पहली और
अंतिम बार
मैं देख रहा था कि
उसके भीतर की उदासी की
धूसर रेत को भिगोती
बेगानी प्रशंसाओे की बौछारों नें
उसे असुविधा में डाल दिया है
रोना चाहता है जार जार
इस बहिष्कार-समारोह में
अपने अगोरते उदास बच्चों का आंसू
जबकि उसके पास रूमाल भी नहीं है
भीगते शब्दों से सराबोर
फूलों-मालाओं लदे इस समारोह से
उसने अलग कर लिया है अपनी आत्मा को
हो गया है अनात्म
मारण उच्चाटन मंत्रों से भरे हुए
अभिनन्दन-भाषणों से
डरी उसकी आत्मा
उठ कर
अपने बाल बच्चों में चली गई है
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