कपिल देव

कपिल देव
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Wednesday, April 8, 2009

कविता की किताब

कल की सुबह के बारे में
कल वाले कल के पहले वाले कल ही सोच लिया जाय
यह सोचते हुए, कल सोचा कि
कल सुबह कविता वाली
वह किताब पढूंगा
दफतर जाने के पहले के वक्त में
दूबे जी से मिलना क्या आज ही जरूरी है
कल न भी मिले
तो क्या
इसतरह तो कविता वाली वह किताब
कब पढ़ी जाएगी ?

अक्षरों और आंखो के बीच तरंगायित समय की दूरियों
को फलांग कर आई आवाजों से
लड़ते हुए
पढ़ते हुए कविता की किताब
सुना मैनें
बेटा कुछ कह रहा था मम्मी से
गुस्से में....
दबा कर दांत मम्मी ने कुछ कहा, सुना जो मैनें वह नहीं था
जो मम्मी नें कहा था
वह नहीं,
मै अपनी आशंका को सुन रहा था जिसमें
पैसा
खरीद फरोख्त
दोस्त से मिलने की मुश्किलात मसलन
मोटर साइकिल में पेट्रोल
महीनें की तारीख आदि
जैसा कुछ सुनाई दिया
यह डर भी कि
भड़क जाएगा लड़का
तंगहाली पर

तन गया तनाव कविता वाली किताब को पढ़ते हुए
कविता
खिसक गई कोने में
खाली कर दी जगह
दुख और अभावों और आशंकाओं
का अंधकार बैठ गया जम कर जहां
बैठना चाहती थी कविता
अभी बिलकुल अभी पहले
कुछ देर

इसी डर और तनाव और अभाव और जरूरत और संकोच से
भरे वक्त में
मैं पढ़ रहा था
कविता वाली वह किताब
दफतर जाने के पहले के हरे भरे वक्त में
खोज रहा था
बचपन का छूटा हुआ
‘सी-सा’ पर फिसलने-चढ़ने का खेल
कविता की किताब में जबकि
डर और अभाव और आशंका और क्रोध से भरा
किताब का बाहर
बदल बदल दे रहा था मेरा भीतर
बार-बार
पढ़ते हुए
कविता की किताब!

इसतरह पढ़ी गई
कविता की किताब
पाटा गया
दफतर के जाने के पहले का हरा भरा वक्त
खेला गया ‘सी-सा’ का खेल
वक्त के कूबड़ पर बिठाई गई
कविता
उछाली गई
दफतर जाने से पहले
कहा गया-
सिद्ध हुई
कविता की ताकत
अपराजेय ?
...................................................
7.4.09

4 comments:

  1. बहुत सुंदर लिखा ... बधाई।

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  2. ये सी सा के खेल में ऊपर नीचे होते तो देखा है लेकिन फिसलपट्टी की तरह फिसलते भी हैं यह पहली बार पढ़ रहा हूं। सी सा पर फिसलते कैसे हैं। कुछ स्‍पष्‍ट करेंगे कवि महोदय या यह केवल एक फैंटेसी ही थी सी सा की।

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  3. गुमनाम वंधु!
    सौ फीसदी सच कहा आप नें। यह गलती हुई। और सच कहूं तो मुझे इसका अंदेशा भी हुआ था कि कहीं कुछ गलत तो नही लिख दिया ? लेकिन मुझे खुशी है कि आप नें इस पर गौर किया। आप सहृदय पाठक हैं। इस त्रुटि को सुधार कर पढ़ेंगे और निहित भावों को समझेंगे।
    संकोच कैसा? पर्दे से बाहर निकलें। प्रकट हों। मै तो आप का कायल हो ही गया। आप का स्वागत करूंगा। विश्वास करें। आप मेरे परिचित या मित्र नहीं हैं तो संकोच कैसा ? और मित्र हैं तो क्या ऐसे ही मित्रधर्म का निर्वाह करेंगे ? वैसे बालि बध का अपना ही आनन्द होता है। मैं समझ सकता हूं।

    आप का एक बार फिर धन्यवाद।
    कपिलदेव

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  4. कपिलदेवजी बहुत जल्‍दी मिलूंगा आपसे।

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